बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जिससे उपरोक्त बातें सत्य सिद्ध हो जाती हैं। पृथ्वी तल से कुछ ऊंचाई पर कोई वस्तु गिराने पर वह नीचे की तरफ आती है। लेकिन यह नियम केवल पृथ्वी पर लागू होता है। बाहरी अंतरिक्ष में कोई वस्तु नीचे फेंकने पर वह कभी नीचे नहीं आयेगी। हाईस्कूल का एक आम साइंस का स्टूडेन्ट गति के समीकरण पढ़ता है। लेकिन वह गति के समीकरण तभी लागू होते हैं जब कोई वस्तु समान त्वरण (Acceleration) से गति कर रही हो। अगर त्वरण समान नहीं है तो यह समीकरण लागू नहीं होते। न्यूटन के गति के नियम सिर्फ उसी वक्त लागू होते हैं जब वस्तु कम वेग से गति कर रही हो। अगर वस्तु का वेग बहुत ज्यादा है (जैसे इलेक्ट्रान या गैलेक्सी का वेग) तो उपरोक्त नियम लागू नहीं होते। इस तरह के केसेज में आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी लगने लगती है।
फलस्वरूप मैकेनिक्स को भी दो भागों में बाँट दिया गया। क्लासिकल मैकेनिक्स, जहां न्यूटन के नियम लागू होते हैं और नॉन क्लासिकल मैकेनिक्स जहां न्यूटन के नियम नहीं लागू होते। अब अगर क्लासिकल मैकेनिक्स के नियम नान क्लासिकल मैकेनिक्स के एक्सपेरीमेन्ट पर लगाये जायें तो कण्टराडिक्शन पैदा होना यकीनी हैं। नतीजा ये निकला कि विरोधाभास सिर्फ हमारी संकीर्ण सोच (Limited Thought) के कारण पैदा होते हैं। साइंस के जितने भी कण्टराडिक्शन हैं वह नियमों को उसकी सीमा की अवहेलना कर लागू किये जाने का परिणाम होते हैं। बहुत से केसेज ऐसे भी होते हैं जिसमें गलत नियमों के कारण भी कण्टराडिक्शन पैदा हो जाते हैं। लेकिन इस प्रकार के केसेज में उन नियमों को रद्द कर दिया जाता है।
साइंटिफिक कण्टराडिक्शन का स्पष्टीकरण :
अब आते हैं उन विरोधाभासों पर जिनका जिक्र इससे पहले हो चुका है। पहले हम साइंटिफिक विरोधाभासों को लेंगे, फिर अल्लाह से सम्बंधित विरोधाभासों को।
कोई पदार्थ तरंग की तरह व्यवहार करता है जबकि तरंग ऊर्जा का रूप होती है और पदार्थ उससे अलग है। यह कण्टराडिक्शन मिट सकता है, अगर हम आइंस्टीन के द्रव्यमान ऊर्जा समीकरण को ध्यान में रखें। इस समीकरण के अनुसार पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है। इस समीकरण के प्रायोगिक प्रमाण एटम बम और न्यूक्लियर रियेक्टर की शक्ल में हमारे सामने मौजूद हैं। इस तरह पदार्थ और ऊर्जा एक दूसरे के विपरीत न होकर एक ही जिस्म के दो रूप हैं। इन्हें सिक्के के दो पहलू भी कहा जा सकता है। प्रारम्भ में दो नियम अलग अलग जाने जाते थे। ऊर्जा संरक्षण का नियम, जिसके अनुसार यूनिवर्स की समस्त ऊर्जा का योग नियत है। ऊर्जा न तो पैदा की जा सकती है और न ही नष्ट । और दूसरा नियम है द्रव्यमान संरक्षण का नियम। जिसके अन्तर्गत यूनिवर्स का समस्त द्रव्यमान नियत है। लेकिन अब ये दोनों नियम एक हो गये हैं। और द्रव्यमान - ऊर्जा संरक्षण के नियम (Conservation of mass & energy) से एक नये नियम की उत्पत्ति हुई। क्योंकि ऊर्जा को द्रव्यमान में और द्रव्यमान को ऊर्जा में बदला जा सकता है। लेकिन अगर कुल ऊर्जा और द्रव्यमान का योग लिया जाये तो यह एक नियतांक होगा।
देखा जाये तो मौजूदा साइंस में पदार्थ (Matter) और ऊर्जा (Energy) को अलग अलग करके अध्ययन नहीं किया जा सकता। क्योंकि इससे नियम संकीर्ण हो जाने से गलत परिणाम मिलने लगते हैं। अब अगर प्रकाश की किरण जो कि तरंग है, फोटानों के रूप में कण की तरह व्यवहार करे और पदार्थिक कण इलेक्ट्रान, अल्फा इत्यादि तरंगों की तरह व्यवहार करे तो इसमें कण्टराडिक्शन होने का कोई मतलब नहीं।
पिछला भागअगला भाग
Ye koun si khoj laye hain aap
ReplyDeleteयह सच है कि आज इंसान दुखी परेशान और आतंकित है लेकिन उसे दुख देने वाला भी कोई और नहीं है बल्कि खुद इंसान ही है ।
ReplyDeleteआज इंसान दूसरों के हिस्से की खुशियां भी महज अपने लिए समेट लेना चाहता है । यही छीना झपटी सारे फ़साद की जड़ है ।
एक दूसरे के हक को पहचानौ और उन्हें अदा करो अमन चैन रहेगा । जो अदा न करे उसे व्यवस्था दंड दे ।
लेकिन जब व्यवस्था संभालने वाले ज़ालिमों को दंड न देकर ख़ुद पक्षपात करें तो अमन चैन ग़ारत हो जाता है । आज के राजनेता ऐसे ही हैं । देश को आज तक किसी आतंकवादी से इतना नुक़्सान नहीं पहुंचा जितना कि इन नेताओं से पहुंच रहा है । ये नेता देश की जनता का विश्वास देश की व्यवस्था से उठा रहे हैं ।
बचेंगे ये ख़ुद भी नहीं ।
आप ने जो बात कही है उसे अगर ढंग से जान लिया जाए तो भारत के विभिन्न समुदायों का विरोधाभास भी मिट सकता है और अब तो अलग अलग दर्जनों चीजों की पूजा करने वाले भी कहने लगे हैं कि सब चीजों का मालिक एक है ।
अब मैं चाहता हूं कि सही ग़लत के Standard scale को भी मान लिया जाना चाहिए ।
देखिए
प्यारी माँ