अल्लाह साकार है अथवा निराकार?
कहो: "वह अल्लाह यकता (अकेला ) है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, न वह जनिता है और न जन्य (अर्थात न वह किसी का बाप / माँ है और न बेटा / बेटी), और न कोई उसका समकक्ष है.- Shahnawaz Siddiqui
कहो: "वह अल्लाह यकता (अकेला ) है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, न वह जनिता है और न जन्य (अर्थात न वह किसी का बाप / माँ है और न बेटा / बेटी), और न कोई उसका समकक्ष है.आमतौर पर यह समझा जाता है कि इस्लाम 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके ‘प्रवर्तक’ पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। लेकिन वास्तव में इस्लाम 1400 वर्षों से काफ़ी पुराना धर्म है; उतना ही पुराना जितना धरती पर स्वयं मानवजाति का इतिहास और हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) इसके प्रवर्तक (Founder) नहीं, बल्कि इसके आह्वाहक हैं। आपका काम उसी चिरकालीन / सनातन धर्म की ओर, जो सत्यधर्म के रूप में आदिकाल से ‘एक’ ही रहा है, लोगों को बुलाने, आमंत्रित करने और स्वीकार करने के आह्वान का था। आपका मिशन, इसी मौलिक मानव धर्म को इसकी पूर्णता के साथ स्थापित कर देना था ताकि मानवता के समक्ष इसका व्यावहारिक रूप साक्षात् रूप में आ जाए।
इस्लाम का इतिहास जानने का अस्ल माध्यम स्वयं इस्लाम का मूल ग्रंथ ‘क़ुरआन’ है। और क़ुरआन, इस्लाम का आरंभ प्रथम मनुष्य ‘आदम’ से होने का ज़िक्र करता है। इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए क़ुरआन ने ‘मुस्लिम’ शब्द का प्रयोग हज़रत इबराहीम (अलैहि॰) के लिए किया है जो लगभग 4000 वर्ष पूर्व एक महान पैग़म्बर (सन्देष्टा) हुए थे। हज़रत आदम (अलैहि॰) से शुरू होकर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तक हज़ारों वर्षों पर फैले हुए इस्लामी इतिहास में असंख्य ईशसंदेष्टा ईश्वर के संदेश के साथ, ईश्वर द्वारा विभिन्न युगों और विभिन्न क़ौमों में नियुक्त किए जाते रहे। उनमें से 26 के नाम कु़रआन में आए हैं और बाक़ी के नामों का वर्णन नहीं किया गया है। इस अतिदीर्घ श्रृंखला में हर ईशसंदेष्टा ने जिस सत्यधर्म का आह्वान दिया वह ‘इस्लाम’ ही था; भले ही उसके नाम विभिन्न भाषाओं में विभिन्न रहे हों। बोलियों और भाषाओं के विकास का इतिहास चूंकि क़ुरआन ने बयान नहीं किया है इसलिए ‘इस्लाम’ के नाम विभिन्न युगों में क्या-क्या थे, यह ज्ञात नहीं है।
इस्लामी इतिहास के आदिकालीन होने की वास्तविकता समझने के लिए स्वयं ‘इस्लाम’ को समझ लेना आवश्यक है। इस्लाम क्या है, यह कुछ शैलियों में क़ुरआन के माध्यम से हमारे सामने आता है, जैसे:
1. इस्लाम, अवधारणा के स्तर पर ‘विशुद्ध एकेश्वरवाद’ का नाम है। यहां ‘विशुद्ध’ से अभिप्राय है: ईश्वर के व्यक्तित्व, उसकी सत्ता व प्रभुत्व, उसके अधिकारों (जैसे उपास्य व पूज्य होने के अधिकार आदि) में किसी अन्य का साझी न होना। विश्व का...बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड और अपार सृष्टि का यह महत्वपूर्ण व महानतम सत्य मानवजाति की उत्पत्ति से लेकर उसके हज़ारों वर्षों के इतिहास के दौरान अपरिवर्तनीय, स्थायी और शाश्वत रहा है।
2. इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा’ और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है।
इस्लाम की वास्तविकता, एकेश्वरवाद की हक़ीक़त, इन्सानों से एकेश्वरवाद के तक़ाज़े, मनुष्य और ईश्वर के बीच अपेक्षित संबंध, इस जीवन के पश्चात (मरणोपरांत) जीवन की वास्तविकता आदि जानना एक शान्तिमय, सफल तथा समस्याओं, विडम्बनाओं व त्रासदियों से रहित जीवन बिताने के लिए हर युग में अनिवार्य रहा है; अतः ईश्वर ने हर युग में अपने सन्देष्टा (ईशदूत, नबी, रसूल, पैग़म्बर) नियुक्त करने (और उनमें से कुछ पर अपना ‘ईशग्रंथ’ अवतरित करने) का प्रावधान किया है। इस प्रक्रम का इतिहास, मानवजाति के पूरे इतिहास पर फैला हुआ है।
4. शब्द ‘धर्म’ (Religion) को, इस्लाम के लिए क़ुरआन ने शब्द ‘दीन’ से अभिव्यक्त किया है। क़ुरआन में कुछ ईशसन्देष्टाओं के हवाले से कहा गया है (42:13) कि ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वे ‘दीन’ को स्थापित (क़ायम) करें और इसमें भेद पैदा न करें, इसे (अनेकानेक धर्मों के रूप में) टुकड़े-टुकड़े न करें।
इससे सिद्ध हुआ कि इस्लाम ‘दीन’ हमेशा से ही रहा है। उपरोक्त संदेष्टाओं में हज़रत नूह (Noah) का उल्लेख भी हुआ है और हज़रत नूह (अलैहि॰) मानवजाति के इतिहास के आरंभिक काल के ईशसन्देष्टा हैं। क़ुरआन की उपरोक्त आयत (42:13) से यह तथ्य सामने आता है कि अस्ल ‘दीन’ (इस्लाम) में भेद, अन्तर, विभाजन, फ़र्क़ आदि करना सत्य-विरोधी है-जैसा कि बाद के ज़मानों में ईशसन्देष्टाओं का आह्वान व शिक्षाएं भुलाकर, या उनमें फेरबदल, कमी-बेशी, परिवर्तन-संशोधन करके इन्सानों ने अनेक विचारधाराओं व मान्यताओं के अन्तर्गत ‘बहुत से धर्म’ बना लिए।
मानव प्रकृति प्रथम दिवस से आज तक एक ही रही है। उसकी मूल प्रवृत्तियों में तथा उसकी मौलिक आध्यात्मिक, नैतिक, भौतिक आवश्यकताओं में कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। अतः मानव का मूल धर्म भी मानवजाति के पूरे इतिहास में उसकी प्रकृति व प्रवृत्ति के ठीक अनुकूल ही होना चाहिए। इस्लाम इस कसौटी पर पूरा और खरा उतरता है। इसकी मूल धारणाएं, शिक्षाएं, आदेश, नियम...सबके सब मनुष्य की प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुकूल हैं।
अतः यही मानवजाति का आदिकालीन तथा शाश्वत धर्म है।
क़ुरआन ने कहीं भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को ‘इस्लाम धर्म का प्रवर्तक’ नहीं कहा है। क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का परिचय नबी (ईश्वरीय ज्ञान की ख़बर देने वाला), रसूल (मानवजाति की ओर भेजा गया), रहमतुल्-लिल-आलमीन (सारे संसारों के लिए रहमत व साक्षात् अनुकंपा, दया), हादी (सत्यपथ-प्रदर्शक) आदि शब्दों से कराया है।
स्वयं पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने इस्लाम धर्म के ‘प्रवर्तक’ होने का न दावा किया, न इस रूप में अपना परिचय कराया। आप (सल्ल॰) के एक कथन के अनुसार ‘इस्लाम के भव्य भवन में एक ईंट की कमी रह गई थी, मेरे (ईशदूतत्व) द्वारा वह कमी पूरी हो गई और इस्लाम अपने अन्तिम रूप में सम्पूर्ण हो गया’ (आपके कथन का भावार्थ।) इससे सिद्ध हुआ कि आप (सल्ल॰) इस्लाम धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। (इसका प्रवर्तक स्वयं अल्लाह है, न कि कोई भी पैग़म्बर, रसूल, नबी आदि)। और आप (सल्ल॰) ने उसी इस्लाम का आह्वान किया जिसका, इतिहास के हर चरण में दूसरे रसूलों ने किया था। इस प्रकार इस्लाम का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानवजाति और उसके बीच नियुक्त होने वाले असंख्य रसूलों के सिलसिले (श्रृंखला) का इतिहास।
यह ग़लतफ़हमी फैलने और फैलाने में, कि इस्लाम धर्म की उम्र कुल 1400 वर्ष है दो-ढाई सौ वर्ष पहले लगभग पूरी दुनिया पर छा जाने वाले यूरोपीय (विशेषतः ब्रिटिश) साम्राज्य की बड़ी भूमिका है। ये साम्राज्यी, जिस ईश-सन्देष्टा (पैग़म्बर) को मानते थे ख़ुद उसे ही अपने धर्म का प्रवर्तक बना दिया और उस पैग़म्बर के अस्ल ईश्वरीय धर्म को बिगाड़ कर, एक नया धर्म उसी पैग़म्बर के नाम पर बना दिया। (ऐसा इसलिए किया कि पैग़म्बर के आह्वाहित अस्ल ईश्वरीय धर्म के नियमों, आदेशों, नैतिक शिक्षाओं और हलाल-हराम के क़ानूनों की पकड़ (Grip) से स्वतंत्र हो जाना चाहते थे, अतः वे ऐसे ही हो भी गए।) यही दशा इस्लाम की भी हो जाए, इसके लिए उन्होंने इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म (Muhammadanism)’ का और मुस्लिमों को ‘मुहम्मडन्स (Muhammadans)’ का नाम दिया जिससे यह मान्यता बन जाए कि मुहम्मद ‘इस्लाम के प्रवर्तक (Founder)’ थे और इस प्रकार इस्लाम का इतिहास केवल 1400 वर्ष पुराना है। न क़ुरआन में, न हदीसों (पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰ के कथनों) में, न इस्लामी इतिहास-साहित्य में, न अन्य इस्लामी साहित्य में...कहीं भी इस्लाम के लिए ‘मुहम्मडन-इज़्म’ शब्द और इस्लाम के अनुयायियों के लिए ‘मुहम्मडन’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, लेकिन साम्राज्यों की सत्ता-शक्ति, शैक्षणिक तंत्र और मिशनरी-तंत्र के विशाल व व्यापक उपकरण द्वारा, उपरोक्त मिथ्या धारणा प्रचलित कर दी गई।
भारत के बाशिन्दों में इस दुष्प्रचार का कुछ प्रभाव भी पड़ा, और वे भी इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म’ मान बैठे। ऐसा मानने में इस तथ्य का भी अपना योगदान रहा है कि यहां पहले से ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जी, ‘‘बौद्ध धर्म’’ के; और महावीर जैन जी ‘‘जैन धर्म’’ के ‘प्रवर्तक’ के रूप में सर्वपरिचित थे। इन ‘धर्मों’ (वास्तव में ‘मतों’) का इतिहास लगभग पौने तीन हज़ार वर्ष पुराना है। इसी परिदृश्य में भारतवासियों में से कुछ ने पाश्चात्य साम्राज्यों की बातों (मुहम्मडन-इज़्म, और इस्लाम का इतिहास मात्र 1400 वर्ष की ग़लत अवधारणा) पर विश्वास कर लिया।
कुछ दिनों पहले मेरा जाना बाराबंकी हुआ तो वहाँ जनाब रिजवान मुस्तफा के अनुरोध पे एक मजलिस ए हुसैन (अ.स) को सुनने का मौक़ा मिला. अरविन्द विद्रोही जी भी वहाँ मजूद थे जिनको मैंने वहाँ बड़े ध्यान से[29: 46] और किताबवालों से बस उत्तम रीति से वाद-विवाद करो - रहे वे लोग जो उनमे ज़ालिम हैं, उनकी बात दूसरी है. और कहो: "हम ईमान लाए उस चीज़ पर जो हमारी और अवतरित हुई और तुम्हारी और भी अवतरित हुई. और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं."
[9:6] और यदि मुशरिकों (जो ईश्वर के साथ किसी और को भी ईश्वर अथवा शक्ति मानते हैं) में से कोई तुमसे शरण मांगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले. फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दो; क्यों वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं है.
इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि एक मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करता) के साथ बुरा व्यवहार करे. इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर-मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की, या डराने की, या आतंकित करने, या उसकी संपत्ति गबन करने की, या उसे उसके सामान के अधिकार से वंचित करने की, या उसके ऊपर अविश्वास करने की, या उसे उसकी मजदूरी देने से इनकार करने की, या उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की जबकि उनका माल खरीदा जाए. या अगर साझेदारी में व्यापार है तो उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है.
इस्लाम के अनुसार यह मुसलमानों पर अनिवार्य है गैर मुस्लिम पार्टी के साथ किया करार या संधियों का सम्मान करें. एक मुसलमान अगर किसी देश में जाने की अनुमति चाहने के लिए नियमों का पालन करने पर सहमत है (जैसा कि वीसा इत्यादि के समय) और उसने पालन करने का वादा कर लिया है, तब उसके लिए यह अनुमति नहीं है कि उक्त देश में शरारत करे, किसी को धोखा दे, चोरी करे, किसी को जान से मार दे अथवा किसी भी तरह की विनाशकारी कार्रवाई करे. इस तरह के किसी भी कृत्य की अनुमति इस्लाम में बिलकुल नहीं है.
जहाँ तक प्यार और नफरत की बात है, मुसलमानों का स्वाभाव ग़ैर-मुसलमानों के लिए उनके कार्यो के अनुरूप अलग-अलग होता है. अगर वह ईश्वर की आराधना करते हैं और उसके साथ किसी और को ईश्वर अथवा शक्ति नहीं मानते तो इस्लाम उनके साथ प्रेम के साथ रहने का हुक्म देता है. और अगर वह किसी और को ईश्वर का साझी मानते हैं, या ईश्वर पर विश्वास नहीं करते या धर्म के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और ईश्वर की सच्चाई से नफरत करते है, तो ऐसा करने के कारणवश उनके लिए दिल में नफरत का भाव आना स्वाभाविक है.
[अल-शूरा 42:15, अर्थ की व्याख्या]:
"और मुझे तुम्हारे साथ न्याय का हुक्म है. हमारे और आपके प्रभु एक ही है. हमारे साथ हमारे कर्म हैं और आपके साथ आपके कर्म."
इस्लाम यह अनुमति अवश्य देता है कि अगर ग़ैर-मुस्लिम मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का एलान करें, उनको उनके घर से बेदखल कर दें अथवा इस तरह का कार्य करने वालो की मदद करें, तो ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.
[60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.
[60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.
क्या इस्लाम काफिरों का क़त्ल करने का हुक्म देता है?
कुछ लोग इस्लाम के बारे में भ्रान्तिया फ़ैलाने के लिए कहते हैं, कि इस्लाम में गैर-मुसलमानों को क़त्ल करने का हुक्म है. इस बारे में ईश्वर के अंतिम संदेष्ठा, महापुरुष मौहम्मद (स.) की कुछ बातें लिख रहा हूँ, इन्हें पढ़ कर फैसला आप स्वयं कर सकते हैं:
"जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है, उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए, अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुंचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए." (Bukhari, Muslim)
"जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई." (Bukhari)
"जिसने एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, मैं उसका विरोधी हूँ और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होउंगा." (Bukhari)
"न्याय के दिन से डरो; मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायतकर्ता रहूँगा जो एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उसपर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा." (Al-Mawardi)
"अगर कोई किसी गैर-मुस्लिम की हत्या करता है, जो कि मुसलमानों का सहयोगी था, तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा." (Bukhari).
एवं पवित्र कुरआन में ईश्वर कहता है कि:
इसी कारण हमने इसराईल की सन्तान के लिए लिख दिया था, कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया। उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं [5:32]
- शाहनवाज़ सिद्दीकी
1. हे आस्तिको ! प्रतिज्ञाओं को पूरा करो। -कुरआन [5, 1]
2. ...और अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन करो, निःसंदेह प्रतिज्ञा के विषय में जवाब तलब किया जाएगा। -कुरआन [17, 34]
3. ...और अल्लाह से जो प्रतिज्ञा करो उसे पूरा करो। -कुरआन [6,153]
4. और तुम अल्लाह के वचन को पूरा करो जब आपस में वचन कर लो और सौगंध को पक्का करने के बाद न तोड़ो और तुम अल्लाह को गवाह भी बना चुके हो, निःसंदेह अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो। -कुरआन [16, 91]
5. निःसंदेह अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतें उनके हक़दारों को पहुंचा दो और जब लोगों में फ़ैसला करने लगो तो इंसाफ़ से फ़ैसला करो। -कुरआन [4, 58]
6. और तुम लोग अल्लाह के वचन को थोड़े से माल के बदले मत बेच डालो (अर्थात लालच में पड़कर सत्य से विचलित न हुआ करो), निःसंदेह जो अल्लाह के यहां है वही तुम्हारे लिए बहुत अच्छा है यदि समझना चाहो। -कुरआन [16, 95]
समाज की शांति के लिए यह ज़रूरी है कि समाज के लोग आपस में किए गए वादों को पूरा करें और जिस पर जिस किसी का भी हक़ वाजिब है, वह उसे अदा कर दे। अगर समाज केसदस्य लालच में पड़कर ऐसा न करें और यह चलन आम हो जाए तो जिस फ़ायदे के लिए वे ऐसा करेंगे उससे बड़ा नुक्सान समाज को वे पहुंचाएंगे और आखि़रकार कुछ समय बादखुद भी वे उसी का शिकार बनेंगे। परलोक की यातना का कष्ट भी उन्हें झेलना पड़ेगा, जिसके सामने सारी दुनिया का फ़ायदा भी थोड़ा ही मालूम होगा। वादे,वचन और संधि केबारे में परलोक में पूछताछ ज़रूर होगी। यह ध्यान में रहे तो इंसान के दिल से लालच और उसके अमल से अन्याय घटता चला जाता है।स्वर्ग में दाखि़ले की बुनियादी शर्त है सच्चाई। जिसमें सच्चाई का गुण है तो वह अपने वादों का भी पाबंद ज़रूर होगा। जो अल्लाह से किए गए वादों को पूरा करेगा, वह लोगों से किए गए वायदों को भी पूरा करेगा। वादों और प्रतिज्ञाओं का संबंध ईमान और सच्चाई से है और जिन लोगों में ये गुण होंगे, वही लोग स्वर्ग में जाने के अधिकारी हैं और जिस समाज में ऐसे लोगों की अधिकता होगी, वह समाज दुनिया में भी स्वर्ग की शांति का आनंद पाएगा।
अमानत को लौटाना भी एक प्रकार से वायदे का ही पूरा करना है। यह जान और दुनिया का सामान जो कुछ भी है, कोई इंसान इसका मालिक नहीं है बल्कि इन सबका मालिक एक अल्लाह है और ये सभी चीज़ें इंसान के पास अमानत के तौर पर हैं। वह न अपनी जान दे सकता है और न ही किसी की जान अन्यायपूर्वक ले सकता है। दुनिया की चीज़ों को भी उसे वैसे ही बरतना होगा जैसे कि उसे हुक्म दिया गया है। दुनिया के सारे कष्टों और आतंकवाद को रोकने के लिए बस यही काफ़ी है।
अरबी में ‘अमानत‘ शब्द का अर्थ बहुत व्यापक अर्थों में प्रयोग किया जाता है।
ज़िम्मेदारियों को पूरा करना, नैतिक मूल्यों को निभाना, दूसरों के अधिकार उन्हें सौंपना और सलाह के मौक़ों पर सद्भावना सहित सलाह देना भी अमानत के दायरे में हीआता है। अमानत के बारे में आखि़रत मे सवाल का ख़याल ही उसके सही इस्तेमाल गारंटी है। कुरआन यही ज्ञान देता है।
वास्तव में सिर्फ़ इस दुनिया का बनाने वाला ही बता सकता है कि इंसान के साथ उसकी मौत के बाद क्या मामला पेश आने वाला है ?
और वे कौन से काम हैं जो उसे मौत के बाद फ़ायदा देंगे ?
वही मालिक बता सकता है इंसान को दुनिया में कैसे रहना चाहिए ?
और मानव का धर्म वास्तव में क्या है ?
कुरआन उसी मालिक की वाणी है जो कि मार्ग दिखाने का वास्तविक अधिकारी है क्योंकि मार्ग, जीवन और सत्य, हर चीज़ को उसी ने बनाया है।
गणितीय पथ पर विचार करने के पश्चात अब हम सृष्टि के मैदान में अल्लाह के वजूद की निशानियों की तलाश करेंगे। इसके लिए इस तरंह का अध्ययन करना होगा कि क्या सृष्टि का निर्माण, मानव और दूसरे प्राणियों की उत्पत्ति संयोगवश हुई है या किन्हीं खास प्रकार की घटनाओं के क्रम में? आज दूसरे प्राणियों के साथ अस्तित्व में आये मानव को जीवित रखने के लिए पृथ्वी का जो पर्यावरण है उसके अनुरूप मानव ने अपने को ढाला है या पर्यावरण स्वयं ऐसे रूप में ढला है जो मानव को जीवित रखने के लिए आवश्यक है। यह समस्त विवेचन अवश्य ही हमें अल्लाह के वजूद की सच्चायी की ओर मोड़ देगा।
इस तरंह खुदा के गुणों के बारे में स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न मस्तिष्क को उद्वेलित कर सकता है। वह यह कि खुदा का वजूद वास्तव में है भी या नहीं? हो सकता है किसी अत्यन्त मेधावी दिमाग ने या कई दिमागों ने एक ऐसी महाशक्ति की कल्पना कर ली हो जिसकी विशेषताएं उपरोक्तानुसार हैं। इस कल्पना के पीछे कई कारण हो सकते हैं। मसलन ये कि कुछ इंसान जो बाकियों से अपने को सम्मान दिलाना चाहते थे, लोगों में एक अदद ईश्वर के बारे में कहानियां फैलाने लगे और अपने को ईश्वर का भेजा दूत कहलाने लगे ताकि लोग उनका सम्मान करने लगें और ईश्वर के साथ साथ उनसे भी डर कर उनकी आज्ञा मानें। लेकिन अगर ऐसी बात होती तो यह मान्यता कुछ स्थानों या ज्यादा से ज्यादा कुछ देशों में पहुंचकर समाप्त हो जाती। और अगर हर जगह होती तो भी ईश्वर की कल्पना हर जगह पर अलग अलग तरीके से की जाती। कहीं उसका कुछ और रूप बताया जाता तो कहीं किसी और रूप में उसके अस्तित्व के बारे में कहा जाता। लेकिन हम देखते हैं कि कुछ भ्रमों को अगर छोड़ दिया जाये तो अल्लाह के गुण हर जगंह समान मिलते हैं।
खुदा को कोई चीज़ ईजाद करने के लिए किसी चिंतन या कल्पना की ज़रूरत नहीं पड़ती। इससे पहले कि कोई चीज़ वजूद में आये, उसे इसका ज्ञान रहता है। ये बात भी कुछ अक्ल से परे हो जाती है क्योंकि मनुष्य अगर किसी चीज़ का निर्माण करता है तो पहले उसके बारे में सोचता है उसकी आवश्यकता कहां पड़ सकती है इस बारे में छानबीन करता है। फिर मन ही मन उसकी रूपरेखा (Structure) तैयार करता है, तब जाकर एक वस्तु तैयार होती है। और इस वस्तु में भी अत्यन्त चिंतन के बाद भी कहीं न कहीं कमी रह जाती है। इस कमी को दूर करने के लिए फिर नये सिरे से रिसर्च की जाती है, उस में नयी खोजों और नये आविष्कारों का उपयोग करके सुधार किया जाता है और नया माडल तैयार हो जाता है।
उदाहरण के लिए जब एडीसन ने बल्ब का अविष्कार किया तो बल्ब में आक्सीजन गैस भरी होने के कारण वह बार बार फेल हो जाता था। फिर उसमें सुधार करके आक्सीजन गैस निकाली गयी और कार्बन का फिलामेंट लगाया गया। लेकिन इसमें कुछ खराबियां थीं। जैसे कि वह जल्दी काला पड़ जाता था और फिलामेन्ट बहुत जल्दी गल जाता था। बाद में फिलामेन्ट परिवर्तित करके टंग्स्टन का लगा दिया गया। इस प्रकार बल्ब का विकसित माडल मिला। परन्तु एडीसन को प्रथम बल्ब के आविष्कार के लिए भी वर्षों का परिश्रम करना पड़ा। पहले उसने कल्पना की, फिर चिंतन किया और अन्त में गणना करके उसे वास्तविक रूप में तैयार किया। जब छोटी से छोटी वस्तु का निर्माण बिना कल्पना और चिंतन के नहीं हो सकता तो अल्लाह ने पूरी सृष्टि बिना कल्पना और चिंतन के कैसे तैयार कर दी?
यहां एक बार फिर खुदा का असीमित ज्ञान अपना कार्य करता है। वास्तव में चिंतन की उस समय जरूरत पड़ती है जब ज्ञान की कमी हो। एडीसन ने जब बल्ब बनाने का प्रयास शुरू किया था तो उसे इस बारे में कोई ज्ञान नहीं था कि बल्ब की कार्यप्रणाली क्या होगी। जैसे जैसे उसने एक्सपेरीमेन्ट किये उसके ज्ञान में बढ़ोत्तरी हुई। अपने प्रयोगों के गुण दोषों के बारे में पता चला और एक दिन वह सफल हो गया। गाड़ी का कोई मैकेनिक प्रारम्भ में बहुत कठिनाई पूर्वक किसी गाड़ी की खराबी दूर कर पाता है। क्योंकि उसे इस बारे में ज्ञान कम रहता है लेकिन एक बार सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने के पश्चात जब वह एक्सपर्ट हो जाता है तो मात्र आवाज से खराबी पकड़ लेता है और बिना किसी विचार या चिंतन के मशीनी अंदाज में पुर्जे खोल खालकर ठीक कर देता है। इस तरंह कल्पना की आवश्यकता उस समय पड़ती है जब हमें किसी नयी वस्तु के बारे में कुछ नहीं मालूम रहता। प्रारम्भ में जब एटामिक स्ट्रक्चर वैज्ञानिको के लिए अज्ञात था और इलेक्ट्रान प्रोटान तथा न्यूट्रान की खोज हो चुकी थी उस समय परमाणु माडल के लिए अनेक कल्पनाएं की गयीं। फिर जैसे जैसे विज्ञान प्रगति करता गया और प्रयोगों के आधार पर जो कल्पना सही सिद्ध हुई उसे लागू कर दिया गया। बाकी को निरस्त कर दिया गया। इस तरंह हम देखते हैं कि ज्ञान की कमी कल्पनाओं और विचारों को जन्म देती है। चूंकि खुदा के पास ज्ञान सम्पूर्ण है, उसमें कहीं कोई कमी नहीं है इसलिए उसे कल्पना या चिंतन करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती।
वास्तव में उसका ज्ञान इतना सम्पूर्ण है कि सृष्टि रचने से पहले वह सृष्टि रचने के बारे में सब कुछ जानता था और सृष्टि में आगे क्या होने वाला है, कौन सी घटनाएं घटेंगी, कौन से प्राणी पैदा होंगे इन सब के बारे में उसे पूर्ण ज्ञान था। किस तरंह उसे भविष्य के बारे में पहले से मालूम हो जाता है, इसकी व्याख्या इससे पहले की जा चुकी है।
ये थी अल्लाह के कुछ ऐसे गुणों की व्याख्या जो सरसरी तौर पर विचार करने पर तर्कसंगत नहीं प्रतीत होते हैं। इनका चिंतन लोगों को भ्रम का शिकार बना देता है और वे अनेक प्रश्नों में उलझ कर गलत दिशा में कदम बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि अल्लाह, ईश्वर या गॉड के बारे में अनेक भ्रांतियां फैल गयी हैं। कुछ ये मानने लगे हैं कि ईश्वर सशरीर है। उसके हाथ, पैर, मुंह, आँख सब कुछ है। कहीं ये मान्यता फैल गयी कि सृष्टि की रचना ईश्वर के एक सूक्ष्म अंश से हुई तो कहीं देवताओं और पैगम्बरों को ईश्वर या अल्लाह के नूर से उत्पन्न बताया जाने लगा। जबकि हकीकत यह है कि अल्लाह ने अपना कोई हिस्सा अलग नहीं किया। बल्कि उसने इन सब की रचना की है।
कुछ लोग यह एतराज़ कर सकते हैं कि दुनिया में बहुत जालिम लोग भी हुए हैं। चंगेज खान जैसे शासकों ने पूरा कत्लेआम मचा दिया था। आधुनिक युग में भी अमेरिका ने एटम बम की मदद से हिरोशिमा और नागासाकी जैसे शहर पूरी तरंह नष्ट कर दिये लेकिन इसके लिए प्रकृति ने उन्हें कोई सजा नहीं दी। और कभी कभी मामूली बातों पर भी सजा मिल जाती है।
इस एतराज का जवाब वही उत्तर हो सकता है जो इससे पहले एक अन्य प्रश्न का जवाब बन चुका है। कि अल्लाह महाशक्ति है और असलियत में उसने बन्दों को सज़ा या जज़ा देने का इरादा कयामत तक के लिए मुल्तवी कर रखा है। इस दुनिया में वह सिर्फ कुछ नमूने दिखाता है और यह नमूने अलग अलग बन्दों के लिए अलग अलग होते हैं। अगर वह सभी बन्दों को एक ही प्रकार की सज़ा या जज़ा देगा तो यह एक अत्यन्त सरल प्रक्रिया हो जायेगी और लोग यह मानने लगेंगे कि यह एक निश्चित प्रक्रिया है ठीक किसी मशीनी सिस्टम की तरंह जो कि वे लोग खुद भी बना सकते हैं। साथ ही वे भले और बुरे काम एक दायरे में रहकर करेंगे। यहां से वे यह सोचना शुरू कर देंगे कि अल्लाह भी उन्हीं जैसी अक्ल रखने वाला कोई प्राणी है जो कहीं अन्य स्थान पर निवास कर रहा है।
अल्लाह का कोई रूप या आकार नहीं है। वह निराकार है। वह किसी को दिखाई नहीं देता और न किसी को दिखाई देगा। यह बात गले से नहीं उतरती। क्योंकि कोई भी वस्तु जीवधारी या निर्जीव किसी न किसी रूप, आकार में हमें प्रभावित करता है। जो वस्तुएं नहीं भी दिखाई देतीं उन्हें वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से देखा जा सकता है। जैसे हवा नंगी आँखों से नहीं दिखाई देती लेकिन माइक्रोस्कोप की मदद से उसके अणु देखे जा सकते हैं। इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, न्यूट्रान वगैरा को कैथोड किरण कम्पनदर्शी, विल्सन क्लाउड चैम्बर और इस प्रकार के दूसरे उपकरणों की मदद से देखा जा सकता है। कुल मिलाकर हमारे आसपास जो भी चीजें हैं उन्हें विभिन्न उपकरणों की मदद से हम देख सकते हैं। फिर अल्लाह, जिसे हर जगह मौजूद माना जाता है क्यों नहीं दिखाई देता?
खुदा से सम्बंधित विवादास्पद गुण :
विरोधाभासों के स्पष्टीकरण के बाद हम खुदा से सम्बंधित उन गुणों का अध्ययन करते हैं जो विवादास्पद माने जाते हैं। ऐसे गुण जो किसी मनुष्य की अक्ल में नहीं समा पाते और इस वजह से वह यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि ईश्वर वास्तव में है या नहीं? क्योंकि उसे वह गुण तर्कसंगत नहीं मालूम होते।
कुछ इस तरह के तर्कसंगत न प्रतीत होने वाले गुण इस प्रकार हैं :
अल्लाह का कोई आकार या रूप नहीं है। वह निराकार है और किसी को दिखाई नहीं देगा। हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार वह कयामत के रोज दिखाई देगा। लेकिन यह मान्यता बेबुनियाद है और कुछ धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी गयी गलतफहमी का परिणाम है। धर्मग्रंथों से इसका कोई सुबूत नहीं मिलता। कुछ मजहब खुदा को सशरीर मानते हैं। लेकिन यह भी एक गलत मान्यता है। दरअसल अल्लाह का निराकार होना लोगों की अक्ल में नहीं समाता और उपरोक्त मान्यताएं इसी कन्फ्यूजन का परिणाम हैं।
अल्लाह हमेशा से है और हमेशा रहेगा। यह बात भी अक्सर लोगों के गले नहीं उतरती और वे उस डोर का सिरा तलाश करने में जुट जाते हैं जहां से खुदा की पैदाइश हुई है। जब वे देखते हैं कि उनके आसपास प्रत्येक प्राणी और वस्तु नश्वर है, कभी न कभी मिट जाती है तो वे अल्लाह से सम्बंधित इस गुण के बारे में कन्फ्यूज हो जाते हैं। इसलिए उसकी उत्पत्ति और अंत के बारे में बहुत सी गलत मान्यताएं प्रचलित हो गयीं। कुछ लोग उसकी उत्पत्ति कमल नाल से मानने लगे तो कुछ ने उसका भी वंश चला दिया। जिसमें एक ईश्वर मिटता है तो दूसरा पैदा हो जाता है। कहीं पर ये मान्यता प्रचलित हो गयी कि मनुष्य जैसे प्राणियों को दूसरे प्राणियों ने बनाया और उन प्राणियों को पुन: दूसरे प्राणियों ने बनाया और इस तरह यह क्रम चलता रहता है।
अल्लाह छुपी हुई बातों को जानता है। किसी प्राणी के मस्तिष्क में कौन से विचार उमड़ रहे हैं और कौन से विचार पैदा होने वाले हैं सबसे वह भली भाँती वाकिफ है। ईश्वर का यह गुण भी कुछ समझ में नहीं आता कि इधर मनुष्य के मस्तिष्क में कोई बात आयी और उधर ईश्वर को मालूम हो गयी। यह कुछ तर्कसंगत नहीं मालूम होता।
अल्लाह हर तरह के जज्ब़ात से बेनियाज़ है। उसे न तो जोश आता है, न क्रोध । न वह खुश होता है न नाराज। न उसे किसी से ईर्ष्या होती है और न ही उसे कोई गम सताता है। न सृष्टि के निर्माण में उसने गर्व का अनुभव किया है और न कोई चीज नष्ट होने पर उसे अफसोस होता है। यानि कोई भी भावना उसे उत्तेजित नहीं कर सकती। अल्लाह का भावनाहीन होना भी तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता है। क्योंकि बहुत से धर्मग्रंथों में इस तरह की कहानियां मिलती हैं जब उसने किसी बन्दे से खुश होकर उसे बहुत कुछ प्रदान कर दिया और किसी जाति से अप्रसन्न होकर प्रलय मचा दी और वह पूरी की पूरी जाति नष्ट हो गयी। हज़रत नूह पैगम्बर के वक्त में आया तूफान इसका उदाहरण है। अगर अल्लाह में क्रोध या प्रसन्न होने की भावना नहीं होती तो क्यों वह इस तरह की घटनाओं को घटित करता है? सृष्टि की रचना के पीछे उसका उद्देश्य क्या है? इस प्रकार के बहुत से सवालों के कारण उसका भावनारहित होना अक्ल से परे हो जाता है।
अगला तर्कसंगत न प्रतीत होने वाला गुण ये है कि वह अनन्त गुणों का स्वामी है। अक्ल से परे लगने वाली बात इसमें ये है कि गुण हम चाहे जितना गिन लें, कहीं न कहीं ये गिनती खत्म हो जायेगी। न्यायप्रियता, ज्ञान, शक्ति इत्यादि शुमार करते चले जाईए। आखिर में हमारे पास शुमार करने के लिए कोई गुण नहीं बचेगा। फिर अल्लाह किसी तरह अनन्त गुणों का स्वामी हो सकता है?
खुदा को सृष्टि की रचना मेंं किसी भी तरह की हरकत की जरूरत नहीं पड़ी। और न ही वह सृष्टि को चलाने के लिए गति करता है। वह बस इरादा करता है और किसी भी तरह का काम अपने अंजाम को पहुंच जाता है। उसका यह गुण भी कुछ विषम प्रतीत होता है। क्योंकि हमें कोई भी कार्य करने के लिए हाथ पैर हिलाने पड़ते हैं, गति करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए बातचीत करने के लिए होंठ हिलाने पड़ेंगे। फोन पर बात करने के लिए नम्बर मिलाना पड़ेगा। कहीं जाने के लिए कदमों का इस्तेमाल करना पड़ता है। जबकि अल्लाह तो जिस्म भी नहीं रखता। बिना किसी हरकत के किस तरंह वह कार्यों को अंजाम दे देता है यह बात कुछ पल्ले नहीं पड़ती।
इसी तरह खुदा को कोई चीज ईजाद करने के लिए किसी चिंतन या कल्पना करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पहले कि कोई चीज वजूद में आये, उसे उसका ज्ञान रहता है। यह गुण भी अक्ल को कुछ विषम सा प्रतीत होता है। क्योंकि मानव अगर कोई आविष्कार करता है तो उसके पीछे बरसों की रिसर्च और पूर्व प्रयोगों का दखल रहता है। पहले वह आविष्कार की कल्पना करता है, उसकी जरूरत महसूस करता है। फिर यह कैसे हो सकता है कि खुदा बिना किसी चिंतन या कल्पना के कोई वस्तु निर्मित कर ले?
विवादास्पद गुणों के स्पष्टीकरण : इस तरह हम देखते हैं कि खुदा से सम्बंधित ये गुण ऐसे हैं जो प्रथम दृष्टि में तर्कसंगत नहीं प्रतीत होते हैं और इनका चिंतन करने वाला उलझनों के जाल में फंसकर सही रास्ते से भटक जाता है और कुछ का कुछ समझने लगता है। जिसमें काफी कुछ उसके अधूरे ज्ञान का भी दखल रहता है। अल्लाह के बारे में फैले अनगिनत भ्रम भी इसके जिम्मेदार होते हैं। और गैर साइंटिफिक चिंतन भी अक्सर गलत परिणाम दे देता है। मैं इस बात का दावा तो नहीं करता कि मेरे विचार शत प्रतिशत सही हैं। लेकिन मैं एक रास्ता जरूर सुझा रहा हूं। यह रास्ता है धर्मग्रंथों के बारे में और खुदा के बारे में साइंटिफिक तरीके से चिंतन। क्योंकि वैज्ञानिक अपना चिंतन इस दिशा में बहुत कम करता है और उसकी रिसर्च ईश्वर से अलग होती है। हालांकि इस कथन के अपवाद हैं। कई महान वैज्ञानिक और फिलास्फर अल्लाह के बारे में चिंतन मनन कर चुके हैं। लेकिन बहरहाल हर मनुष्य एक अलग तरीके से सोचता है। दूसरी बात ये है कि साइंस लगातार डेवलप होती रहती है। पुराने नियम खंडित होते हैं नये बनते हैं। किसी बात को सिद्ध करने के लिए नये नये उदाहरण सामने आते हैं। स्पष्ट है कि आज से पचास वर्ष पहले अगर वैज्ञानिक कोई निष्कर्ष निकाल चुके हैं तो आज वर्तमान में वे गलत सिद्ध हो सकते हैं।
तो अब एक एक कर अल्लाह से सम्बंधित उन गुणों को लेते हैं जो मानव मन में सैंकड़ों सवाल पैदा कर देते हैं।
समस्त मनुष्यों के लिए आर्थिक गतिविधियां, स्फ़ूर्ति, रचनात्मकता और परिपूर्णता का कारण बनती है। समाज की आधी जनसंख्या के रूप में महिलाएं भी इसी प्रकार का अधिकार रखती हैं। महिलाएं आर्थिक गतिविधियों और प्रयासों द्वारा अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर समाज और पारिवारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए प्रभावी और सार्थक भूमिका निभाने में सक्षम हो जाती हैं। अलबत्ता इसी के साथ सरकारों को भी विभिन्न आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं की क्षमताओं से लाभ उठाने के लिए कार्यक्रम बनाना चाहिए।
आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक क्षेत्रों और अन्य समस्त क्षेत्रों में महिलाओं को आगे बढ़ाना, महिलाओं की क्षमताओं से लाभ उठाने के लिए मुख्य क़दम है। इसीलिए इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन ओआईसी ने महिलाओं के स्थान को ऊंचा उठाने के उद्देश्य से इस्लामी देशों में महिलाओं की स्थिति की समीक्षा करने के लिए विभिन्न सम्मेलनों का आयोजन किया। इन सम्मेलनों में वर्ष 2005 में इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों के विदेशमंत्रियों ने यमन में निर्णय किया कि अर्थव्यवस्था और परिवार के क्षेत्रों में महिलाओं के स्थान को बढ़ाने के लिए इस संगठन की महिला मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित करेंगे। इसका पहला सम्मेलन तुर्की में और दूसरा क़ाहिरा में आयोजित हुआ था। दूसरे सम्मेलन में ईरान के प्रतिनिधियों की ओर से वर्ष 2010 में तेहरान में इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों के तीसरे सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मति से पारित हो गया।
19 दिसम्बर को इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों का तीसरा सम्मेलन तेहरान में आरंभ हुआ और तीन दिनों तक जारी रहा। इस तीन दिसवीय सम्मेलन में 20 महिला मंत्रियों सहित इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों के 43 प्रतिनिधि सम्मलित हुए। इस सम्मेलन का मुख्य विषय था महिला, परिवार और अर्थव्यवस्था। यह विषय, इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के दस वर्षीय क्रियाकलापों और इस्लामी मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं के विकास के आधार पर चुना गया था। इस सम्मेलन में समीक्षा किए जाने वाले बिन्दुओं में से एक मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि और उपभोग मानक में सुधार था। प्रस्तुत किए गये अन्य विषयों में से एक वैश्विक आर्थिक संकट से उत्पन्न होने वाली हानियों और इस्लामी देशों में महिलाओं के आर्थिक और राजनैतिक परिवर्तनों में होने वाली हानियों को कम करना है। इस परिधि में फ़िलिस्तीन, पाकिस्तान, इराक़ और दूसरे मुसलमान देशों की महिलाओं को होने वाली हानियों को कम करने के उपायों को बयान करना और समीक्षा करना है। इसी प्रकार इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों और प्रतिनिधियों ने इस्लामी देशों की एकता, आर्थिक क्षेत्रों और कारकों की समीक्षा करते हुए मुसलमान महिलाओं की भागीदारी और विकास के विषय पर भाषण दिए।
राष्ट्रपति डाक्टर महमूद अहमदी नेजाद ने इस सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में महिला, परिवार और अर्थव्यवस्था को महत्त्वपूर्ण तत्व और समाज के कल्याण का कारण बताया और कहा कि महिला, परिवार के गठन का मुख्य बिन्दु और तत्व है। कृपाशील होना, सुख शांति प्रदान करना और प्रबंधक व प्रशिक्षण तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में महिलाओं की मुख्य भूमिका उल्लेखनीय है। राष्ट्रपति ने महिलाओं पर पश्चिम की भौतिक दृष्टि की ओर संकेत करते हुए कहा कि हालिया दशक में वर्चस्ववादियों और सम्राज्यवादियों ने महिलाओं का अपमान करने का प्रयास किया है और उन्होंने उनके विकास और परिपूर्णता तक पहुंचने के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न की है और परिवार को तोड़ने का प्रयास किया ताकि महिलाओं के प्रेम और स्नेह के स्रोत को समाप्त कर दें और महिलाओं के मुख्य मोर्चे को ध्वस्त कर दें। इसके विपरीत राष्ट्रपति ने इस्लामी देशों की महिलाओं की भूमिका को सामाजिक गतिविधियों और परिवार में महिलाओं के वास्तविक स्थान और हस्तियों को पुनर्जिवित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण बताया और कहा कि इस्लामी देशों और बहुत से देशों की महिलाएं, मानवीय और ईश्वरीय विचार धाराओं पर आधारित शक्तिशाली विचारधारा और वैचारिक आधारभूत संरचना से संपन्न हैं।
महिलाएं लक्ष्यों से भलिभांति अवगत हैं और हज़रत मरियम, हज़रत ख़दीजा और हज़रत फ़ात्मा सलामुल्लाह अलैहा जैसी महिलाओं के आदर्श को अपनाए हुए हैं।
इस समय महिलाओं को पहले से अधिक अपनी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक भूमिकाओं के मध्य गम्भीर समन्वय की आवश्यकता है। राष्ट्रपति कार्यालय में परिवार और महिला मामलों के केन्द्र की प्रमुख डाक्टर मरियम मुजतहिद ज़ादे ने इस सम्मेलन में आर्थिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि का लक्ष्य आर्थिक प्रगति से बढ़कर बताया और इसका लक्ष्य को सक्रिय और लचकदार मानवीय संपत्ति को उत्पन्न करना बताया और कहा कि समाज में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक उपस्थिति को कभी भी ऐसा नहीं होना चाहिए कि वो व्यक्तिगत सुरक्षा और परिवार में महिलाओं की भूमिका को ख़तरे में डाल दे। मुसलमान महिलाओं को मातृत्व और पत्नी की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर बल देते हुए अपनी योग्यताओं और इस्लामी मूल्यों पर भरोसा करते हुए अर्थ व्यवस्था के ढांचे में गतिविधियां करनी चाहिए।
इस्लामी समाज में यौन भेदभाव से मुक़ाबला करना, महिलाओं में जागरूकता बढ़ाना, उनकी समस्याओं का समाधान करना, यह सब महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ करने की ओर बढ़ाए गये क़दमों में से है। इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के महासचिव अकमलुद्दीन एहसान ओग़लू ने महिला मंत्रियों के सम्मेलन में इस बात की ओर संकेत करते हुए कि इस्लामी जगत की लगभग आधी जनसंख्या मुसलमान महिलाओं की है, कहा कि बहुत सी संस्थाओं में महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील भूमिका के रूप में महिलाओं की भूमिका को ध्यान में रखना आवश्यक है। इस्लामी देशों की कार्यवाहियां, महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव को मिटाने और उसके विकास और प्रगति में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने के लिए होनी चाहिए।
उन्होंने यह बयान करते हुए कि अधिकतर महिलाएं जल्दबाज़ी में किए गये फ़ैसलों, भ्रांतियों और समाज पर छाए नकारात्मक संस्कारों की बलि चढ़ती हैं, स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति उत्पन्न की जानी चाहिए कि पर्याप्त शिक्षाओं और वर्तमान विज्ञान तक महिलाओं की पहुंच सरल बनाई जाए ताकि इस माध्यम से समस्याओं का समाधान किया जाए।
वैज्ञानिक स्तर पर महिलाओं की क्षमताओं को विकसित करना, उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए क़दमों में से एक क़दम है। आज़रबाईजान गणराज्य के प्रतिनिधि मण्डल की प्रमुख सदाक़त क़हरमानू ने इस सम्मेलन में महिलाओं के शिक्षण और वैज्ञानिक स्तर को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि प्रगति और विकास की परिधि में महिलाओं में पायी जाने वाली क्षमताओं को सक्रिय करने के लिए पहला क़दम, विज्ञान, उद्योग, अर्थव्यवस्था और राजनैतिक विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के वैज्ञानिक स्तर को ऊपर उठाना है।
क़हरमानुवा ने इस बात को बयान करते हुए कि महिलाएं, प्रेम, संवेदना और अन्य ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभ उठाते हुए श्रेष्ठ मनुष्यों के प्रशिक्षण में सफलता से कार्य कर सकती हैं, कहा कि शिक्षित महिलाएं और समाज की बुद्धजीवी महिलाएं, अपने ज्ञान से लाभ उठाते हुए समाज की अगली पीढ़ी को बहुत अच्छे ढंग से प्रशिक्षित कर सकती हैं।
इसी आधार पर महिलाओं की क्षमताओं को व्यवहारिक बनाने के लिए महिलाओं को शिक्षित करना अति आवश्यक है। खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आज़रबाईजान गणतंत्र सहित कुछ देशों ने महिलाओं की धार्मिक गतिविधियों को सीमित करके विशेषकर हेजाब पर प्रतिबंध लगाकर व्यवहारिक रूप से उनके ज्ञान संबंधी विकास में गम्भीर बाधाएं उत्पन्न कर दी हैं।
सर्वकालिक धर्म इस्लाम में महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों और उनके कार्य करने में किसी भी प्रकार की रोक टोक नहीं है। इस युक्ति के साथ कि मुसलमान महिलाओं का कार्य और उनकी गतिविधियां महिलाओं और उनके परिवार के अनुरूप होनी चाहिए। मिस्र की सर्वोच्च महिला परिषद की सचिव श्रीमति फ़रखुंदेह मुहम्मद हसन मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में इस्लामी मूल्यों की रक्षा और इस्लामी सिद्धांतों पर कटिबद्धता पर बल देते हुए कहती हैं कि इस्लामी मूल्यों की रक्षा के साथ महिलाओं के कार्य करने या उनके द्वारा आर्थिक गतिविधियों संलग्न होने में किसी भी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। इस्लाम के आरंभिक काल में आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति का स्पष्ट उदाहरण पैग़म्बरे इस्लाम (स) की प्रिय पत्नी हज़रत ख़दीजा हैं। ईरान उन सफल देशों में से है जिसने ईरानी महिलाओं के स्थान को पहचनवाने और उनको पहचान प्रदान करने में बड़ी सफलता प्राप्त की है। यह सफलता इस्लाम धर्म की उच्च शिक्षाओं के पालन, स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई के मार्ग दर्शक बयानों की अनुकंपाओं की छत्रछाया में प्राप्त की गई है। इसीलिए प्रबंधन, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विज्ञान, सांस्कृति और व्यायाम के विभिन्न क्षेत्रों में ईरानी महिलाएं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
वर्तमान समय में ईरान में महिलाएं सरकार, संसद और प्रबंधन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से उपस्थित हैं। इसी प्रकार ईरान के विश्वविद्यालयों में छात्राओं की संख्या 60 प्रतिशत है। इसीलिए बहुत से पश्चिमी बुद्धिजीवियों ने यह स्वीकार किया है कि इस्लामी जगत में महिलाओं के लिए उचित आदर्श ईरानी महिलाएं हैं। तेहरान में इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन की महिला मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने वाली श्रीमति फ़रखुंदह मुहम्मद हसन सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में ईरानी महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहती हैं कि हमको खुलकर यह मान लेना चाहिए कि ईरानी महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका और उपस्थिति ने हमें आश्चर्य चकित कर दिया है। सामाज और इस्लामी मूल्यों की रक्षा सहित महिलाओं की जिस भूमिका पर भी हम आस्था रखते हैं उसका व्यवहारिक और स्पष्ट उदाहरण ईरानी महिलाएं हैं।
इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों की महिला मंत्रियों का तीसरा सम्मेलन 42 अनुच्छेदों पर आधारित घोषणापत्र पारित करके समाप्त हो गया। इस घोषणापत्र में परिवार और समाज में महिलाओं का विकास, इस्लामी देशों में विकास और प्रगति के महत्त्वपूर्ण तत्वों में बताया गया है। इसके अतिरिक्त घोषणापत्र का मुख्य विषय यह है कि परिवार और समाज दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका को पुनर्जिवित करने के लिए ऐसी अर्थव्यवस्था उत्पन्न की जाए जिसमें परिवार को मुख्य केन्द्र और ध्रुव माना गया हो। इसी प्रकार इस घोषणापत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक सम्मान रूप से पहुंच, हिंसा के मुक़ाबले में समर्थन और सहायता प्राप्त होना और फ़ैसले की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी पर विशेष रूप से बल दिया गया है।
घोषणा पत्र में इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों और उपस्थित लोगों ने समस्त सदस्य देशों में पीड़ित महिलाओं और बच्चों से सहृदयता व्यक्त करते हुए फ़िलिस्तीनी बच्चों और महिलाओं के अधिकारों को स्वीकार करने और उनको उनके अधिकार दिलवाने पर बल दिया।
साभार: इस्लामी धर्म एकता परिषद
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