खुदा के बारे में कांट्राडिक्शन के स्पष्टीकरण : साफ है कि खुदा के बारे में अध्ययन के समय जो कांट्राडिक्शन हमें दृष्टव्य होते हैं, उसमें भी उपरोक्त घटक जिम्मेदार हैं। यानि सीमित सोच, वैज्ञानिक नियमों की सीमा और वैज्ञानिक उपकरणों की सीमा। और ऐसा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि खुदा ने सृष्टि की रचना की। प्रत्येक प्राणी सृष्टि का अंग है। स्पष्ट है कि मनुष्य द्वारा जिन नियमों की खोज की गयी या रचना की गयी उनकी कसौटी पर खुदा को नहीं परखा जा सकता।
लेकिन चूंकि इस पुस्तक में खुदा तक साइंटिफिक दृष्टि से पहुंचने की कोशिश की जा रही है इसलिए सबसे पहले पीछे इंगित किये गये कांट्राडिक्शन पर विचार करना जरूरी है।
खुदा हर जगह है लेकिन सृष्टि की किसी भी वस्तु से पूरी तरह अलग थलग है। ये दो परस्पर विरोधी विचार नास्तिकों के लिए एक मजबूत दलील का कार्य करते हैं। क्योंकि खुदा अगर किसी प्राणी में है तो उस प्राणी के प्रत्येक अणु और एटम से संलग्न रहेगा। तो फिर वह अलग कैसे हो सकता है? लेकिन थोड़ा गहराई में जाने पर इस एतराज में कोई दम नहीं दिखता। वास्तव में इस एतराज के पैदा होने की वजह है कि खुदा को भी दूसरे प्राणियों की तरह पदार्थिक मान लिया जाता है। जबकि धर्मग्रंथों से यह सिद्ध होता है कि खुदा एक महाशक्ति (Super Power) है। और महाशक्ति पदार्थ की मोहताज नहीं होती।
शक्ति या ऊर्जा का एक छोटा सा रूप प्रकाश है। एक ऐसे मैदान की कल्पना कीजिए जहां बहुत से लोग इकट्ठा हैं। सूर्य की प्रकाश किरणें पूरे मैदान को रोशन रखती हैं लेकिन वहां मौजूद कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि प्रकाश उसके शरीर का या वहां उपस्थित किसी अन्य वस्तु का अंग है।
इसमें कुछ लोग यह एतराज कर सकते हैं कि उस मैदान में बहुत सी जगहों पर प्रकाश नहीं पहुंचेगा। जैसे किसी ठोस चीज के नीचे, या जहां किसी व्यक्ति की परछाईं बन रही होगी। यहां यह जान लेना जरूरी है कि प्रकाश ऊर्जा का एक बहुत ही कमजोर रूप है। अगर ऊर्जा का शक्तिशाली विकिरण जैसे एक्स किरणें या गामा किरणें उस मैदान पर डाली जायें तो सम्पूर्ण मैदान का कोई भाग उनसे अछूता नहीं बचेगा। साथ ही साथ ये किसी वस्तु का हिस्सा भी नहीं बनेंगी। जब मामूली शक्तियों का यह हाल है तो इन शक्तियों के रचनाकर्ता के बारे में समझा जा सकता है कि ये बातें उसके लिए मामूली से भी कम हैं। इस प्रकार उपरोक्त विरोधाभास केवल गलत सोच का परिणाम है।
खुदा ने अपने बन्दों को किस प्रकार का बनाया है? बन्दों को किसी सीमा के अन्तर्गत कैद किया गया है, या उन्हें असीमित अधिकार दिये गये हैं? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए हमें अल्लाह के ज़ाते पाक के तीन गुण अपने जहन में रखने पड़ेंगे, ज्ञान, न्यायप्रियता और हमेशा विद्यमान रहने वाला।
इन्हीं कसौटियों के आधार पर हम इस प्रकार के एतराजों के जवाब दे सकते हैं। वास्तव में खुदा ने प्रत्येक बन्दे को कुछ सीमा तक आजाद बनाया है और कुछ सीमा में उसे कैद कर दिया है। किसी व्यक्ति की शक्ल सूरत, उसका अपाहिज होना या पूरी तरह ठीक ठाक होना खुदा की देन है। इसमें बन्दे का कोई दखल नहीं है। हाँ काफी हद तक उसके माँ बाप और पूर्वजों का दखल इसमें हो सकता है। वास्तव में किसी बच्चे का पैदा होना, उसकी बनावट उस बच्चे के पूरे वंश के क्रियाकलापों का फल होता है। यहां पर खुदा की न्यायप्रियता जाहिर होती है। अब उस व्यक्ति को कर्म के मामले में खुदा स्वतन्त्र कर देता है। चाहे वह व्यक्ति तन मन ध्ना अच्छे कार्यों में लगाये या बुरे कार्यों मे। उसके लिए खुदा उसे स्वतन्त्र कर देता है। अल्लाह ने प्रत्येक प्राणी को हवा, पानी और भोजन का मोहताज बनाया है। लेकिन इन सब की च्वाइस के लिए आजाद कर दिया है। हां इन सब में वह यह जरूर देखता है कि खाने पानी का वह व्यक्ति अपनी मेहनत से प्रबंध कर रहा है या किसी का माल हड़पकर। इन्हीं कर्मों पर निर्भर है मृत्यु के बाद स्वर्ग या नर्क की प्राप्ति।
सवाल उठता है कि खुदा किसी को अत्याचार करने से रोकता क्यों नहीं? और किसी को अत्याचार सहने पर क्यों नियुक्त कर देता है? यह तो अत्याचार करने वाले के प्रति उसका प्रोत्साहन हो गया। और अत्याचार सहने वाले के प्रति उसका जुल्म हो गया। लेकिन ऐसा नहीं है। पृथ्वी पर जो भी जुल्म या अत्याचार होते हैं वह बन्दों के लिए परीक्षा की घड़ी होते हैं। जालिम उस परीक्षा से गुजरकर नर्क का भागीदार हो जाता है जबकि मज़लूम व बेगुनाह स्वर्ग का। हालांकि अल्लाह को इसका पूर्व ज्ञान रहता है कि कौन नर्क का भागीदार है और कौन स्वर्ग का। लेकिन परीक्षा द्वारा वह स्वयं उन बन्दों को बताना चाहता है कि मैंने तुम्हें स्वर्ग या नर्क में उचित स्थान दिया है और तुम इसी काबिल थे। यह बात उसकी न्यायप्रियता से लागू होती है। इस तरह हम देखते हैं कि प्रत्येक प्राणी कुछ बातों में स्वतन्त्र है और बाकी में सीमित।
अब एक दूसरा सवाल पैदा होता है कि खुदा ने मनुष्य को दूसरे जानवरों से बुद्धिमान क्यों बनाया। जानवरों में भी कुछ ज्यादा बुद्धिमान होते हैं और कुछ कम। सरसरी तौर पर देखने पर अल्लाह का यह भेदभाव पूर्ण नजरिया समझ में नहीं आता। लेकिन अगर हम अपनी अक्ल की सीमा बढ़ाकर और अपने नियमों से दूर हटकर विचार करें तो यहां भी खुदा की न्यायप्रियता देखने को मिलती है। अल्लाह व्यक्तिगत प्राणियों को उनकी क्षमता और ग्रहण करने की शक्ति के आधार पर नेमतों का वितरण करता है। और साथ ही साथ जातियों और वंशों पर भी उसका यही नियम लागू होता है। मानव जाति की क्षमता अधिक होने के कारण उसे बुद्धिमता ज्यादा प्रदान की गयी है जबकि मछली जैसे प्राणी को बहुत कम। लेकिन साथ ही साथ ज्यादा पावर और बुद्धिमता वाले प्राणी पर प्रतिबन्ध भी बहुत ज्यादा लगा दिये गये हैं ताकि वह उनका दुरूपयोग न कर सके और दूसरे प्राणियों के साथ उसका शक्ति संतुलन रह जाये। यही ईश्वर की न्यायप्रियता है।
मनुष्य को दूसरे प्राणियों जैसे हाथी और कछुए की तुलना में औसत उम्र बहुत कम मिली है। मक्खी और मच्छर जैसे कीटों की तुलना में उसे कम जन्म दर दी गयी है। और साथ ही उसे नर्क जैसा भय दिखाया गया है। फिर भी इंसान को अशरफुल मखलूकात (सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ) कहा गया है। क्योंकि वह अल्लाह को पहचान कर उसकी इबादत कर सकता है।
अब यहां एक सवाल बाकी रह जाता है कि अल्लाह ने सभी प्राणियों और सभी चीजों को एक जैसा क्यों नहीं बनाया? इस पृथ्वी पर कहीं इतनी बारिश होती है कि बाढ़ आने की नौबत रहती है तो कहीं साल भर सूखा रहता है और रेगिस्तान के सिर्फ धूल भरे टीले नज़र आते हैं। कहीं दूर दूर तक समुन्द्र दिखाई देता है तो कहीं ऊंचे पहाड़। यानि पृथ्वी पर कहीं भी एक दूसरे स्थानों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं। कोई तारतम्य नहीं दिखाई पड़ता। तो इसका जवाब ये हो सकता है कि जटिलता विभिन्नता में होती है। अगर किसी फैक्ट्री में एक ही तरह की मशीनें लगी हों तो उन्हें कण्ट्रोल करना आसान होता है। उनका मैकेनिज्म समझकर उनका निर्माण कर लेना बहुत मुश्किल नहीं होता और एक आम दिमाग उन्हें आसानी से कर लेता है। लेकिन अगर हर मशीन एक अलग वेरायटी की हो तो यकीनन उनका कण्ट्रोल मुश्किल हो जाता है। बड़े से बड़ा दिमाग जो इस पृथ्वी पर मौजूद है यह दावा नहीं कर सकता कि वह पृथ्वी पर मौजूद हर मशीन की रिपेयरिंग कर सकता है। या उन्हें बना सकता है। हां इतना जरूर है कि जितना तीक्ष्ण मस्तिष्क होगा उतना ही अधिक उसका ज्ञान होगा और उतनी ही विभिन्न प्रकार की मशीनों को वह समझ सकेगा। अब आप उस महाशक्ति की कल्पना कीजिए, अगर वह सभी स्थान, सभी वस्तुएं और सभी प्रकार के प्राणी एक जैसा बना देता तो उसकी शक्ति पर उंगली उठ सकती थी। यह आश्चर्य नहीं तो और क्या है कि हर प्राणी की उसके वक्त पर जरूरत पूरी हो जाती है। जबकि प्रत्येक प्राणी अपनी अलग खुराक रखता है, अलग प्रकार का भोजन होता है। शेर को मांस चाहिए तो हिरन को घास। छिपकलियों को कीट चाहिए तो तितलियों का भोजन फूलों का रस है। इन सब के बावजूद हर प्राणी अपने लोक में विचरण करता हुआ अपने पेट की आग बुझा लेता है। इन उदाहरणों से ईश्वर की शक्ति और ज्ञान का पूरा सुबूत मिल जाता है।
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