इस्लाम ने ब्याजखोरी का भी तीव्र निषध किया है । सिर्फ़ चोरी न करना इतना ही नहीं , आपकी आजीविका भी शुद्ध होनी चाहिए । गलत रास्ते से की गई कमाई को शैतान की कमाई कहा गया है । इसीलिए ब्याज लेने की भी मनाही की गई है । कहा गया है कि सूद पर धन मत दो , दान में दो ।
मोहम्मद साहब को दर्शन हुआ कि ब्याज लेना आत्मा के विरुद्ध काम है । कुरान में यह वाक्य पाँच-सात बार आया है – ” आप अपनी दौलत बढ़ाने के लिए ब्याज क्यों लेते हैं ? संपत्ति ब्याज से नहीं दान से बढ़ती है । ” बारंबार लिखा है कि ब्याज लेना पाप है , हराम है । इस्लाम ने इसके ऊपर ऐसा प्रहार किया है , जैसा हम व्यभिचार या ख़ून की बाबत करते हैं । परंतु हम तो ब्याज को जायज आर्थिक व्यवहार मानते हैं ! वास्तव में देखिए तो ब्याजखोरी, रिश्वतखोरी वगैरह पाप है । ब्याज लेने का अर्थ है , लोगों की कठिनाई का फायदा उठाते हुए पैसे कमाना । इसकी गिनती हम लोग कत्तई पाप में नहीं करते ।
वास्तव में देखा जाए तो अपने पास आए पैसे को हमें तुरंत दूसरे की तरफ़ धकेल देना चाहिए । फ़ुटबॉल के खेल में अपने पास आई गेंद हम अपने ही पास रक्खे रहेंगे , तो खेल चलेगा कैसे ? गेंद को खुद के पास से दूसरे को फिर तीसरे को भेजते रहना पड़ता है , उसीसे खेल चलता है । पैसा और ज्ञान , इन्हें दूसरे को देते रहेंगे तब ही उनमें वृद्धि होगी ।
मेरा मानना है कि ब्याज पर जितना प्रहार इस्लाम ने किया है किसीने नहीं किया है । ब्याज पर इस्लाम ने यह जो आत्यंतिक निषेध किया है , उसको समाज को कभी न कभी स्वीकार करना ही पड़ेगा । वह दिन जल्दी आना चाहिए , हमें उस दिन को जल्दी लाना चाहिए । एक बार ब्याज का निषेध हो गया , तो संग्रह की मात्रा बहुत घट जाएगी । इस्लाम ने ब्याज न लेने का यह जो आदेश दिया है, उसका यदि अमल किया जाए तो पूँजीवाद का ख़ातमा ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगा । जिसे हम सच्चा अर्थशास्त्र कहते हैं उसके बहुत निकट का यह विचार है । मुझे लगता है कि साम्यवाद की जड़ का बीज मोहम्मद पैगम्बर के उपदेश में है ।
वे एक ऐसे महापुरुष हो गये जिन्होंने ब्याज का निषेध किया तथा समता का प्रचार किया । इस उसूल को उन्होंने न सिर्फ़ जोर देकर प्रतिपादित किया बल्कि उसकी बुनियाद पर संपूर्ण इस्लाम की रचना उन्होंने इस प्रकार की, जैसी और किसी ने नहीं की ।
वैसे तो ब्याज लेने की बात पर सभी धर्मों ने प्रहार किया है। हिंदु धर्म ने ब्याज को ’ कुसीद ’ नाम दिया है , यानि खराब हालत बनाने वाला, मनुष्य की अवनति करने वाला । उसके नाम मात्र में पाप भरा है । ब्याज न लेना यह चित्तशुद्धि का काम है , पापमोचन है । ब्याज लेना छोड़ना ही चाहिए । वैसे, ब्याज के विरुद्ध तो सभी धर्मों ने कहा है परन्तु इस्लाम जितनी स्पष्टता और प्रखरता से अन्य किसी ने भी नहीं कहा है । ... [जारी]
- विनोबा भावे साभार: http://kashivishvavidyalay.wordpress.com
Vinoba ji ne edum sahi likha hai, islamic system hi world ke liye best system hai.
ReplyDeleteIs website ke sabhi article ek se badhkar ek he. Jazakallah!
ReplyDeletenice post
ReplyDeletebahut badhia sandesh diya hai Vinoba bhave ji ne
ReplyDeleteमेरा मानना है कि ब्याज पर जितना प्रहार इस्लाम ने किया है किसीने नहीं किया है । ब्याज पर इस्लाम ने यह जो आत्यंतिक निषेध किया है , उसको समाज को कभी न कभी स्वीकार करना ही पड़ेगा । वह दिन जल्दी आना चाहिए , हमें उस दिन को जल्दी लाना चाहिए ।
ReplyDeletebahut badhia hai ji.
इस्लाम ने ब्याज न लेने का यह जो आदेश दिया है, उसका यदि अमल किया जाए तो पूँजीवाद का ख़ातमा ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगा । जिसे हम सच्चा अर्थशास्त्र कहते हैं उसके बहुत निकट का यह विचार है । मुझे लगता है कि साम्यवाद की जड़ का बीज मोहम्मद पैगम्बर के उपदेश में है ।
ReplyDeleteवे एक ऐसे महापुरुष हो गये जिन्होंने ब्याज का निषेध किया तथा समता का प्रचार किया । इस उसूल को उन्होंने न सिर्फ़ जोर देकर प्रतिपादित किया बल्कि उसकी बुनियाद पर संपूर्ण इस्लाम की रचना उन्होंने इस प्रकार की, जैसी और किसी ने नहीं की ।
bahut pasand aaya yeh to
बहुत ही बढ़िया बातें लिखी विनोबा भावे जी ने, उनका बहुत-बहुत शुक्रिया. इस्लाम धर्म की बातें हर वक़्त के हिसाब से हैं, आज दुनिया को ज़रूरत है एक ऐसे सामाजिक और बैंकिंग सिस्टम की जिसे सिर्फ इस्लाम ही मुहैय्या करा सकता है.
ReplyDeleteआचार्य विनोबा भावे बहुत बड़े विद्वान थे उन्होने इस्लाम पर कई किताबें लिखी
ReplyDeleteआचार्य विनोबा भावे जी ने इस लेख में जो बातें बताई वोह सच में बेहतरीन हैं. ब्याज के आदान-प्रदान से इंसानियत समाप्त होती जा रही है. ज़रूरतमंद लोगो की मदद करने की जगह लोग इन्वेस्टमेंट के नाम पर चलने वाले ब्याज के अड्डों पर पैसा लगाना बेहतर समझने लगे हैं.
ReplyDeleteआज ऐसे लेखों के अधिक से अधिक प्रचार की आवश्यकता है
ReplyDeleteबिकुल सही कहा लेकिन जो ब्याजखोर हैं , जिन्हें लोगों को तदपने में मज़ा आता है , जो गरीब को और गरीब करना चाहते हैं वो इस ब्याज का विरोध क्यों करें , वहां धर्म कर्म सब बराबर है उनके लिए
ReplyDeletedabirnews.blogspot.com
एक बेहतरीन लेख़
ReplyDeleteब्याज की वजह से भारत में 20 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या करके मर गए और लाखों भविष्य में मरने वाले हैं ।
ReplyDeleteसूद लेने वाले ये आर्थिक आतंकवादी न तो पाकिस्तान से आते हैं और न ही कश्मीर से । फिर ये दुर्दांत क़ातिल कहाँ से आते हैं ?
किसके संरक्षण में ये अपना बूचड़ख़ाना चलाते हैं ?
पानी तक को छानकर पीने वाले इंसानों का बेधड़क कैसे पीते हैं ?
और फिर भी ये जमाने में नेक नाम हैं , क्यों ?
इस पर विचार करने का समय आ गया है ।
भारत का उद्धार अब होके रहेगा ।
ऐसा लगता है ।
अब उन तमाम जीवन पद्धतियों के निरस्त होने का समय आ चुका है जो ब्याज के लेन देन को जायज करार देती हैं , इस घिनौने जुर्म को प्रोत्साहन देती हैं ।
ReplyDeleteवास्तव में वे मरण पद्धतियां हैं , न कि जीवन पद्धतियां । ब्याज मौत है और ब्याज लेने वाले क़र्ज़दार की जान तो मूल में लेते हैं और ब्याज में उसकी आबरू का चीरहरण करते हैं ।
दुःखद है वास्तव में ही ।
Mashallah a gud Initiative... :)
ReplyDeleteIslamic banking is d only solution in todays world's Economy Fluctuation.
विनोबा का आलेख प्रसारित करने के लिए आभार । उम्मीद है उनके अन्य आलेख भी इस ब्लॉग से लेंगे।
ReplyDeleteअफलातून जी,
ReplyDeleteआपका बहुत-बहुत इस्तकबाल है, मुस्तकबिल में भी मुस्लिम समाज से सम्बंधित आलेख साभार वहां से यहाँ ज़रूर प्रकाशित करेंगे