मेरी उनसे मुलाक़ात 28 अगस्त 2010 को दिन में हुई, शाम को ही उनका फ़ोन आ गया कि अगर मैं उन्हें वक्त दे सकूं तो वे पादरी साहब को लेकर मेरे घर आना चाहते हैं। मैंने कहा कि मुझे बेहद खुशी होगी, आप रोज़ा इफ़तार हमारे साथ करना चाहें तो इफ्तार के वक्त तशरीफ़ ले आयें वर्ना उसके थोड़ी देर बाद। उन्होंने इफ़तार के बाद साढ़े सात बजे आने के लिये कहा और वे दोनों अपने अपने दुपहिया वाहनों के ज़रिये 7.35 बजे शाम आ भी गये।
मैंने अपने बेटे अनस ख़ान को हिदायत की थी कि बेटे आज खुदा की मुक़द्दस किताब का इल्म रखने वाले दो लोग हमारे घर आ रहे हैं लिहाज़ा जब हमारी गुफ़तगू हो तो आप हमारे पास ही रहना और हमारी बात सुनना।
पादरी व्यवस्था के बजाय मौजज़े पर बल क्यों देते हैं?
मुकेश लॉरेंस साहब ने पादरी साहब का नाम राकेश चार्ली बताया। वे मैथोडिस्ट चर्च से जुड़े हुए हैं। पादरी साहब जिस्म में थोड़ा हल्के से और उम्र में मुझसे कम थे। उनके अंदर भी मैंने नर्मी देखी। मैंने उन्हें बाइबिल और नया नियम की प्रतियां दिखाईं। नया नियम को तो मैं पिछले 27 सालों से पढ़ता आ रहा हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि वे मुझे अगली मुलाक़ात में नया नियम की उर्दू प्रति देंगे।
मेरी कुछ शुरूआती बात सुनने के बाद वे बोले कि आदमी जब तक मौज्ज़े के ज़रिये ईमान का निजि अनुभव नहीं कर लेता, तब तक वह ईमान को वास्तव में नहीं समझ सकता।
सवाल का संतोषजनक जवाब देना ही ईसा अ. का मार्ग है
मैंने अर्ज़ किया-‘देखिये, हरेक का निजी अनुभव अलग हो सकता है। मेरा निजी अनुभव कुछ और हो सकता है और आपका निजी अनुभव कुछ और हो सकता है। इसलिए मेरा निजी अनुभव आपके लिए और आपका निजी अनुभव मेरे लिए दलील नहीं बन सकता। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के पास जब कभी यहूदी, फ़रीसी या सदूक़ी कोई भी सवाल लेकर आये तो उन्होंने हमेशा उन्हें ऐसे जवाब दिए जिससे उनकी बुद्धि संतुष्ट हो गई या फिर वे निरूत्तर हो गये। उन्होंने कभी किसी से यह नहीं कहा कि आप किसी चमत्कार या निजी अनुभव के द्वारा सच्चाई को पाने की कोशिश कीजिये।
चमत्कार तो शैतान भी दिखा सकता है लेकिन वह ईश्वरीय व्यवस्था पर नहीं चल सकता
चमत्कार तो लोगों ने मसीह के ज़रिये भी होते देखे और एंटी-क्राइस्ट के ज़रिये भी होते देखेंगे और न्याय दिवस के दिन कुछ ऐसे लोग भी मसीह को हे प्रभु , हे प्रभु कहते हुए उनके पास मदद पाने के लिए पहुंचेंगे जिन्होंने दुनिया में उनके नाम से लोगों को दुष्टात्माओं को निकाला होगा और अजनबी भाषाओं में कलाम किया होगा लेकिन मसीह उन्हें धिक्कार कर भगा देंगे और कहेंगे कि हे पापियों मैंने तो तुम्हें कभी जाना ही नहीं। इसलिए सिर्फ़ चमत्कार ही पैमाना नहीं बन सकता बल्कि उसके साथ यह भी देखा जायेगा कि चमत्कार दिखाने वाला मसीह की तरह शरीअत का पाबंद है या नहीं। एंटी- क्राइस्ट शरीअत का पाबंद नहीं होगा यही उसकी सबसे बड़ी पहचान होगी।
इंजील के हुक्म को न मानने वाले ईसाई कैसे हो सकते हैं ?
मैं इंजील और मसीह में आस्था रखता हूं और आप भी। मैं कुरआन और हज़रत मुहम्मद स. में आस्था रखता हूं लेकिन आप नहीं रखते। सो हमारे आपके दरम्यान इंजील और मसीह कॉमन ग्राउंड है। इसलिए हम दोनों के लिए इंजील और मसीह अलैहिस्सलाम दलील बनेंगे। इनसे न तो मैं भाग सकता हूं और न ही आपको इनसे हटने की इजाज़त दूंगा।‘
पादरी साहब ने माना कि आपकी बात सही है। मसीह के आने का मक़सद था व्यवस्था को पूरा करना, उस पर खुद चलना और लोगों को चलने की हिदायत करना
मैंने कहा-‘हम पाबंद हैं मसीह के क़ौल के, न कि उनके बाद के सेंट पॉल आदि आदमियों के। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कहते हैं कि ‘यह न समझो कि मैं धर्म-व्यवस्था या नबियों की शिक्षाओं को मिटाने आया हूं। मैं उनको मिटाने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूं। मैं तुमसे सच कहता हूं कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं तब तक धर्म-व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा। इसलिए जो मनुष्य इन छोटी सी छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़ेगा और वैसा ही लोगों को सिखाएगा कि वे भी तोड़ें तो वह स्वर्ग के राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा। परन्तु जो उन आज्ञाओं का पालन करेगा और दूसरों को उनका पालन करना सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में महान कहलाएगा।‘ (मत्ती, 5, 17-20)
अब आप बताईये कि सेंट पॉल ने किस अधिकार से शरीअत मंसूख़ कर दी ? वे कहते हैं कि ‘यीशु ने अपने शरीर में बैर अर्थात व्यवस्था को उसकी आज्ञाओं तथा नियमों के साथ मिटा दिया। (इफिसियों, 2, 15)
यूहन्ना के चेलों ने जब मसीह से उनके साथियों के रोज़ा न रखने की वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि ‘वे दिन आएंगे जब दूल्हा उनसे अलग कर किया जाएगा। उस समय वे उपवास करेंगे।‘ (मत्ती, 9, 15)
उन्होंने यह तो कहा कि वे अभी रोज़ा नहीं रख रहे हैं लेकिन कहा कि वे कुछ समय बाद रखेंगे। अस्ल बात यह थी कि मसीह धर्म प्रचार के लिए लगातार सफ़र करते रहे और मुसाफ़िर को इजाज़त होती है कि वह बाद में रोज़े रख ले। उन्होंने हमेशा शरीअत की पाबंदी की बात की और कहीं भी उसे ख़त्म नहीं किया। सेंट पॉल ने शरीअत माफ़ कर दी ताकि रोमी और अन्य जातियां मसीह पर ईमान ला सकें। उन्होंने चाहे कितनी ही नेक नीयती से यह काम किया हो लेकिन उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार ही नहीं था।
मुसलमानों से सीखने की ज़रूरत है
आप देखते हैं कि हिंदुस्तान में कुछ लोग मुसलमानों द्वारा दी जाने वाली कुरबानी पर ऐतराज़ जताते हैं लेकिन मुसलमानों ने कभी उन्हें रिझाने की ग़र्ज़ से शरीअत को निरस्त घोषित नहीं किया। उनसे कहा जायेगा कि यह शरीअत ऐसी ही ठीक है आपका दिल चाहे कुबूल करके नजात पायें और आप इन्कार करना चाहें तो आपकी मर्ज़ी। पॉल को भी यही करना चाहिये था।
शरीअत कैंसिल करने के बाद फिर आप क्यों कहते हैं कि औरत चर्च में अपना सिर ढके ? यह हुक्म तो शरीअत का है और शरीअत को आप कैंसिल ठहरा चुके हैं।
जीवन को व्यवस्थित करने के लिए व्यवस्था ज़रूरी है
आदमी को जीने के लिये क़ानून दरकार है। उसे जायदाद का बंटवारा भी करना होता है और शादी-ब्याह और दूसरे सामाजिक मामले भी होते हैं। जब आपने शरीअत को कैंसिल कर दिया तो फिर आपने नेता चुने, उन्होंने आपके लिए क़ानून बनाये और आपने उन्हें माना। मैं पूछता हूं कि जब आपको क़ानून की ज़रूरत भी थी और आपको उसे मानना भी था तो फिर जो क़ानून खुदा ने मूसा को दिया था उसे मानते लेकिन आपने उसे छोड़ा और दुनिया के क़ानून को माना। आपने ऐसा क्यों किया ?
बाइबिल को एक से दो बना डाला
प्रोटैस्टेंट ने किस अधिकार से 7 किताबें जाली घोषित करके उन्हें बाइबिल से बाहर निकाल दिया ?
और फिर हर बीस साल बाद आप एक नया एडीशन ले आते हैं जिसमें हर बार पिछली बाइबिल के मुक़ाबले आयतें कम या ज़्यादा करते रहते हैं , ऐसा क्यों ? आज चर्च की हालत यह हो रही है कि हम आये दिन अख़बारों में पढ़ते रहते हैं कि चर्च में समलैंगिक जोड़ों की शादियां कराई जा रही हैं। जबकि नबी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के ज़माने में समलैंगिकों पर खुदा का अज़ाब नाज़िल हुआ था।
पादरी साहब ने हामी भरी और मुकेश लॉरेंस भी पूरी दिलचस्पी से सुन रहे थे।
चर्च की धार्मिक रस्मों में शराब का प्रयोग क्यों?
मैंने कहा-‘आज चर्च में धार्मिक रस्म के तौर पर शराब पिलाई जा रही है। हज़रत मसीह पाक हैं और शराब नापाक। क्या कभी कोई नबी लोगों को शराब पिलाएगा ?
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘इंजील में हज़रत मसीह का एक चमत्कार लिखा है कि उन्होंने पानी को दाखरस बना दिया। मैंने कहा हो सकता कि दाखरस उस समय कोई शरबत वग़ैरह हो जिसे आज शराब समझ लिया गया हो ?
दाखरस ‘शराब‘ ही होता है
पादरी साहब बोले-‘लोग समझते हैं कि चर्च में वाइन पिलाई जाती है ऐसा नहीं है। दाखरस अंगूर का रस होता है। चर्च में वही रस पिलाया जाता है।
मैंने कहा-‘क्या उस रस में फ़र्मंटेशन होता है ?‘
उन्होंने कहा-‘हां‘
मैंने कहा-‘फ़र्मंटेशन के बाद रस से दो ही चीज़ें बनती हैं। एक एसीटिक एसिड यानि सिरका और दूसरे अल्कोहल यानि शराब। अब बताईये कि क्या वह रस सिरका होता है ?‘
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘तब वह दाखरस शराब ही होता है। किसी इबादतख़ाने में धर्म के नाम पर धार्मिक लोगों को शराब पिलाई जाये, इससे बड़ा अधर्म भला क्या होगा ?‘
पादरी साहब चुप रहे।
हज़रत मसीह ने जिसे हराम ठहराया उसे भी हलाल कैसे ठहरा लिया ?
मैंने कहा-‘यही हाल आपने खाने-पीने में हलाल-हराम का किया। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक बार बिना हाथ धोये खाना खाने लगे। यहूदियों ने ऐतराज़ किया कि आप बिना हाथ धोये खाते हैं ? तब उन्होंने जवाब दिया कि जो चीज़ बाहर से अन्दर जाती है वह नापाक नहीं करती बल्कि जो चीज़ अन्दर से बाहर आती है वह इनसान को नापाक करती है।‘
उनकी बात सही थी। हाथ की धूल इनसान की दिल को नापाक नहीं करती बल्कि दिल की नापाकी और गुनाह का बोल इनसान को नापाक कर देता है। इससे नसीहत यह मिलती है कि इनसान को गुनाह की बातें ज़बान से नहीं निकालनी चाहिये और अपने दिल को पाक रखना चाहिये। अगर सफ़र में कहीं बिना हाथ धोये खाना पड़ जाये तो दीन में इसकी इजाज़त है।
‘जो बाहर से अन्दर जाता है वह नापाक नहीं करता‘ इस उसूल को इतना एक्सपैंड क्यों कर लिया कि सुअर और हराम जानवर खाना भी जायज़ कर बैठे ? हराम-हलाल की जानकारी देने के लिए मसीह ने यह बात नहीं कही थी। हराम-हलाल जानना था तो शरीअत से मालूम करते, जिसकी पाबंदी मसीह ने जीवन भर की, उनकी मां ने की। क्या कभी मसीह अलैहिस्सलाम ने सुअर खाया ?
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘तब आप सुअर खाना कहां से जायज़ कर बैठे ?‘
वे चुप रहे।
हज़रत ईसा अ. की जान के दुश्मन यहूदियों की साज़िशें
मैंने कहा-‘हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम प्रतीकात्मक भाषा बोलते थे और दृष्टांत देते थे क्योंकि यहूदी हमेशा उनकी घात में रहते थे कि उनके मुंह से कोई बात पकड़ें और उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके सज़ा दिलायें। यहूदियों ने धर्म को व्यापार बना दिया था। इबादतख़ानों को तिजारत की मंडी बनाकर रख दिया था। मसीह ने उनकी चैकियां इबादतख़ानों में ही उलट दी थीं और उन्हें धिक्कारा था। (मरकुस, 11, 15)
मसीह की मौजूदगी उनकी नक़ली दीनदारी की पोल खोल रही थी और उनके लिए अपनी चैधराहट क़ायम रखना मुश्किल हो रहा था। इसीलिए एक बार वे एक व्यभिचारिणी औरत को पकड़कर मसीह के पास लाये कि इसे क्या सज़ा दी जाये ? ताकि अगर मसीह शरीअत के मुताबिक़ सज़ा सुनाये तो वे उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके उन्हें सज़ा दिलायें और अगर वे उसे माफ़ कर दें तो उन्हें नबियों की शरीअत मिटाने वाला कहकर पब्लिक में उन्हें मशहूर करें।
हज़रत मसीह अ. ने ऐसी बात कही कि यहूदियों की सारी साज़िश ही फ़ेल हो गई। उन्होंने कहा कि ‘तुम में जो निष्पाप हो, वही पुरूष सबसे पहिले इसको पत्थर मारे।‘ (यूहन्ना, 8, 8)
यह सुनकर किसी ने उस औरत को पत्थर न मारा। इस मौक़े पर भी मसीह अलैहिस्सलाम ने यहूदी चैधरियों और उनके पिछलग्गुओं को आईना दिखा दिया और ऐलानिया उन्हें गुनाहगार ठहरा दिया।
मसीह की हिकमत के सामने निरूत्तर हो गये साज़िश करने वाले
ऐसे ही एक बार उनसे साज़िशन पूछा गया कि क़ैसर को कर देना कैसा है ? ताकि अगर वे शरीअत के मुताबिक़ क़ैसर को कर देने से मना करें तो वे उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके सैनिकों के हवाले कर सकें और अगर वे कर देने के लिये कहें तो वे उन्हें शरीअत के खि़लाफ़ अमल करने वाला ठहरा सकें।
इस बार भी इन दुष्टों को मुंह की खानी पड़ी। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने उनसे एक सिक्का लेकर पूछा कि ‘यह मूर्ति और नाम किसका है ?
उन्होंने कहा-‘कै़सर का।‘
तब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम बोले कि‘ जो क़ैसर है वह क़ैसर को दो और जो खुदा का है वह खुदा को दो।‘ (मरकुस, 12, 16 व 17)
मसीह की तरह उनका कलाम भी बुलंद है उनके कलाम को उनके शिष्य ही नहीं समझ पाते थे
हज़रत मसीह का कलाम बहुत बुलंद है, इतना ज़्यादा बुलंद कि बहुत बार उनके साथ रहने वाले वे लोग भी उनके कहने की मुराद नहीं समझ पाते थे जिन्हें कि ख़ास तौर पह खुदा की तरफ़ से आसमानी बादशाहत के रहस्यों की समझ दी गयी थी, और एक वजह यह भी थी कि वे सभी आम समाज से आये थे।
‘उन बारहों को यीशु की एक भी बात समझ में नहीं आई। यीशु की बात का अर्थ उनसे छिपा रहा। जो कहा गया था, वह उनकी समझ में न आया।‘ (लूका, 18, 34)
हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम की बातों में छिपी चेतावनियों को यहूदी आलिम बखूबी समझते थे क्योंकि वे नबियों की किताबें पढ़ने की वजह से नबियों के अन्दाज़े-कलाम से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे लेकिन मसीह के प्रेरितों की समझ उस दर्जे की न थी। यही वजह है कि प्रेरितों को अक्सर मसीह से पूछना पड़ा कि हे गुरू आपके कहने का तात्पर्य क्या है ?
जब मसीह ने खुदा के कलाम को बीज की मिसाल देकर समझाया तब भी प्रेरितों को उनसे पूछना पड़ा कि वे कहना क्या चाहते हैं ? (मरकुस, 4, 10-12)
परमेश्वर को ‘पिता‘ कहने का वास्तविक अर्थ
मसीह ने खुदा को पिता कहकर पुकारा क्योंकि इस्राइली जाति में आने वाले नबी खुदा को अलंकारिक रूप से बाप कहकर संबोधित करते आये थे। उन्हीं नबियों की तरह मसीह ने भी खुदा को पिता कहा लेकिन लोगों ने अलंकार को यथार्थ समझ लिया और मसीह को खुदा को ऐसा ही बेटा ठहरा दिया जैसा कि आम इनसानों में बाप-बेटे का रिश्ता होता है। मसीह ने खुद को आदम का बेटा भी कहा है। यहां वे यथार्थ ही कह रहे हैं। मसीह को इंजील में पवित्रात्मा का बेटा, दाऊद का बेटा और यूसुफ़ बढ़ई का बेटा भी कहा गया है। यूसुफ़ को उनकी परवरिश करने की वजह से उनका बाप कहा गया है, दाऊद के वंश से होने के कारण दाऊद को उनका बाप कहा गया और पवित्रात्मा ने मसीह को अपना पु़त्र उनकी रूहानी खूबियों की वजह से कहा।
पवित्र इंजील में पांच लोगों के साथ उनके बाप-बेटे के रिश्ते का ज़िक्र आया है। हमें हरेक जगह उसकी सही मुराद को समझना पड़ेगा, अगर हम सत्य को पाना चाहते हैं तो, वर्ना अगर हम हरेक जगह बाप शब्द का एक ही अर्थ समझते गये तो फिर हम सच नहीं जान पाएंगे।
परमेश्वर के लिए पिता शब्द कहना अलंकार मात्र है, उसे लिटेरल सेंस में लेना ऐसी ग़लती है जिसकी वजह से ईसा मसीह को पहले खुदा का बेटा मान लिया गया और फिर उन्हें खुदा ही मान लिया गया। उन्हीं से दुआएं मांगी जाने लगीं जबकि वे खुद ज़िन्दगी भर खुदा से दुआएं मांगते रहे और अपनी दुआओं के पूरा होने पर खुदा का शुक्र बुलंद आवाज़ में अदा करते रहे ताकि कोई उनके ज़रिये से होने वाले चमत्कार देखकर कन्फ़्यूज़ न हो जाये और उन्हें खुदा न समझ बैठे।
मुर्दे को ज़िन्दा करने वाला खुदा है, मसीह अ. तो खुदा से ज़िन्दगी के लिए दुआ किया करते थे
उन्होंने लाजरस को आवाज़ दी और लाजरस अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया, ज़िन्दा होकर तब भी मसीह ने खुदा का शुक्र अदा किया और कहा कि तू सदा मेरी प्रार्थना सुनता है। (यूहन्ना, 11, 42)
इसका मतलब लाजरस को ज़िन्दा करने के लिए मसीह ने खुदा से दुआ की थी और खुदा ने उनकी दुआ कुबूल कर ली थी। लाजरस का ज़िन्दा होना खुदा के हुक्म से था।
यहां से यह भी पता चलता है कि मसीह की दुआ हमेशा सुनी गई। इसलिये यह नामुमकिन है कि मसीह की आखि़री रात की दुआ न सुनी गई हो। जब मसीह तन्हाई में जाकर घुटने टेककर खुदा से दुआ करते हैं कि ‘हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले। तो भी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूर्ण हो ?‘ (लूका, 22, 42)
खुदा ने हज़रत ईसा अ. की हर दुआ कुबूल की
मसीह ने ऐसा मौत के डर से नहीं कहा बल्कि उन्हें मालूम था कि उनके इन्कार के बदले में इन्कारी अज़ाब का शिकार होंगे और उन्हें मसीह मानने वाले अभी कच्चे हैं, उन्हें कुछ समय और चाहिये। मसीह की कोई दुआ कभी रद्द नहीं हुई, यह दुआ भी रद्द नहीं हुई लिहाज़ा मौत का कटोरा खुदा ने उनके सामने से हटा लिया और उन्हें जीवित ही आसमान पर उठा लिया। उन्हें सलीब पर चढ़ाया तो ज़रूर गया लेकिन सलीब पर उन्हें मौत नहीं आई। वे सलीब पर बेहोश हो गए। दूर से देखने वालों ने समझा कि वे मर गए। यह लोगों की सोच थी न कि हक़ीक़त। (लूका, 23, 49)
जो कहे कि मार्ग, जीवन और सच्चाई मैं ही हूं। (यूहन्ना, 14, 6) जो साक्षात जीवन हो उसे मौत आ भी कैसे सकती थी ? जबकि उसने खुदा से मौत का कटोरा अपने सामने से हटाने की दुआ भी की हो (मरकुस, 14, 36) और उसकी दुआ मालिक ने कभी रद्द न की हो। (यूहन्ना, 11, 42)
हज़रत ईसा अ. को मौत नहीं आई, वे ज़िन्दा हैं
मसीह को जब सलीब से उतारा गया तो वे बेहोश थे न कि मुर्दा। उन्हें यूसुफ़ अरमतियाह ने गुफ़ानुमा एक क़ब्र में रखा। उनके बदन पर मारपीट की चोटों के भी ज़ख्म थे और उस भाले का भी जो सिपाहियों ने चलते-चलते उन्हें मारा था और खून और पानी उनके बदन से निकला था (यूहन्ना, 19, 34) जोकि खुद उनकी ज़िन्दगी का सुबूत है।
तीसरे दिन मरियम मगदलीनी उनकी क़ब्र पर पहुंची लेकिन उनकी क़ब्र ख़ाली थी। हज़रत ईसा ने उसे संबोधित किया-‘हे नारी ! तू क्यों रो रही है ? तू किसे ढूंढ रही है ? (यूहन्ना, 20, 15) तो वह उन्हें पहचान नहीं पाई, वह उन्हें माली समझी। तब ईसा अलैहिस्सलाम ने खुद को उस पर ज़ाहिर किया तब वह उन्हें पहचान पाई। उन्होंने उसे खुद को छूने से रोक दिया क्योंकि वे ज़ख्मी थे। यहां यह भी क़ाबिले ग़ौर है कि उन्होंने मरियम से कहा कि मुझे मत छू ; क्योंकि मैं अब तक पिता के पास ऊपर नहीं गया हूं। (यूहन्ना, 20, 17)
और सलीब पर अपने साथ टंगे हुए एक डाकू से कहा था कि ‘मैं तुझसे सच कहता हूं, आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा । (लूका, 23, 43)
ख़ैर खुदा ने मसीह की दुआ सुन ली और उन्हें आसमान पर उठा लिया जहां से वे दोबारा तब आयेंगे जब कि खुदा उन्हें भेजना चाहेगा।
पादरी साहब और लॉरेंस मेरी बात को दिलचस्पी और ग़ौर से सुन रहे थे।
खुदा ने मसीह अ. को सलीब पर मरने के लिए भेजा ही नहीं था
खुदा ने मसीह को सलीब पर मरने के लिए नहीं भेजा था और न ही खुद मसीह की मर्ज़ी थी कि वे सलीब पर मरें। इसीलिए उन्होंने खुदा से ‘दुख के कटोरे‘ को हटाने की दुआ की। वे सलीब पर मरें, ऐसा तो यहूदी चाहते थे। उन्हें डर था कि अगर उन पर ईमान लाने वालों की तादाद इसी तरह बढ़ती रही तो रोमी उन्हें बाग़ी समझेंगे और उनकी जगह और जाति पर क़ब्ज़ा कर लेंगे। इसलिए वे कहते थे कि ‘हमारी भलाई इस बात में है कि हमारी जाति के लिए एक मनुष्य एक मरे और सारी जाति नष्ट न हो।‘ (यूहन्ना, 11, 50)
साज़िश में कही गयी मसीह के दुश्मनों की बात उनपर ईमान लाने वालों का अक़ीदा कैसे बन गई ?
आपने कैसे मान लिया कि लोगों को पैदाइशी गुनाह से मुक्ति दिलाने के लिए मसीह एक बेऐब मेमने की मानिन्द सलीब पर कुर्बान हो गए ?
ईसा अ. बच्चों को मासूम और स्वर्ग का हक़दार मानते थे न कि जन्मजात पापी
मसीह ने कभी बच्चों को पैदाइशी गुनाहगार नहीं माना। एक बार लोग अपने बच्चों को उनके पास लाये ताकि वे उनपर अपना हाथ रखें और बरकत की दुआ दें। पर चेलों ने उनको डांटा। यह देखकर मसीह ने नाराज़ होकर उनसे कहा कि ‘बच्चों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो; क्योंकि परमेश्वर का राज्य ऐसों का ही है। मैं तुमसे सच कहता हूं कि जो कोई परमेश्वर के राज्य को छोटे बच्चे के समान ग्रहण न करे, वह उस में कभी प्रवेश करने न पाएगा।‘
यीशु ने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी। (मरकुस, 10, 14-16)
मसीह ने तो अपने साथियों से कहा कि वे खुद को बच्चों की मानिन्द बनायें हालांकि वे महीनों से उनके साथ थे और उन्होंने मसीह के ज़रिये होने वाले चमत्कार भी देखे थे और उन्हें ‘ईमान का निजी अनुभव‘ भी था। उन्होंने बच्चों से नहीं कहा कि वे उनके साथियों की मानिन्द बनें। अगर बच्चे पैदाइशी गुनाहगार होते तो वे अपने साथियों को उनकी मानिन्द बनने की नसीहत हरगिज़ न करते।
परमेश्वर का मेमना बचा लिया गया
दूसरी बात मेमने की कुरबान होने के बारे में है। ओल्ड टेस्टामेंट में है कि मेमना बचा लिया गया। मेमना प्रतीक है मसीह का। जब मेमने के बारे में आया है कि उसे बचा लिया गया तो इसका मतलब यही है कि मसीह को बचा लिया गया। धर्मशास्त्र में भी आया है कि ‘मैं दया से प्रसन्न से होता हूं बलिदान से नहीं।‘ (मत्ती, 12, 7)
न तो कोई बच्चा पैदाइशी गुनाहगार होता है और न ही मसीह सलीब पर लोगों के पापों के प्रायश्चित के तौर पर कुरबान होने के लिए भेजे गए थे और न ही वे सलीब पर मरना चाहते थे और न ही वे सलीब पर मरे।
मसीह का मिशन क्या था ?
मसीह का मिशन था लोगों को शैतान की गुलामी और गुनाहों की दलदल से निकालना। इसके लिए वे चाहते थे कि लोग दीनदारी का दिखावा न करें बल्कि सचमुच दीनदार बनें। इसीलिए उन्होंने कहा कि ‘हे पाखंडी शास्त्रियों और फ़रीसियों , तुम पर हाय ! तुम पोदीने, सौंफ़ और ज़ीरे जैसी छोटी-छोटी वस्तुओं का दसवां अंश देते हो। परन्तु तुम ने धर्म-व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात न्याय, दया और विश्वास को छोड़ दिया है। तुम्हें चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अन्धे अगुवों, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊंट को निगल जाते हो। (मत्ती, 23, 23 व 24)
यहां पर भी मसीह ने शरीअत को कैंसिल नहीं किया बल्कि लोगों को डांटा कि वे शरीअत के अहम हुक्मों पर अमल नहीं कर रहे हैं।
मसीह का मिशन था ‘सत्य पर गवाही देना‘
वे कहते हैं कि ‘मैंने इसीलिए जन्म लिया और इसीलिए संसार में आया हूं कि सत्य पर गवाही दूं।‘ (यूहन्ना, 18, 37)
उन्होंने कहा कि ‘हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो और मुझसे सीखो। (मत्ती, 11, 28 व 29)
मसीह का जूआ लादने के लिए ज़रूरी था कि जो जूआ उन पर पहले से लदा है वे उसे उतार फेंके, लेकिन जो फ़रीसी वग़ैरह इन ग़रीब लोगों पर अपना जूआ लादे हुए थे वे कब चाहते थे कि लोग उनके नीचे से निकल भागें।
‘तब फ़रीसियों ने बाहर जाकर यीशु के विरोध में सम्मति की, कि यीशु का वध किस प्रकार करें। (मत्ती, 12, 14)
नक़ली खुदाओं की दुकानदारी का ख़ात्मा था मसीह का मिशन
नबी के आने से नक़ली खुदाओं की खुदाई का और उनके जुल्म का ख़ात्मा होना शुरू हो जाता है, इसलिये इनसानियत के दुश्मन हमेशा नबी का विरोध करते हैं और आम लोगों को भरमाते हैं।
तब नबी का उसके देश में निरादर किया जाता है, उसे उसके देश से निकाल दिया जाता है और यरूशलम का इतिहास है कि वहां के लोगों ने बहुत से नबियों को क़त्ल तक कर डाला।
मसीह के साथ किया गया शर्मनाक बर्ताव और उन्हें क़त्ल करने की नाकाम कोशिश भी उसी परम्परा का हिस्सा थी।
मसीह का मिशन, खुदा का मिशन था और खुदा के कामों को रोकना किसी के बस में है नहीं
आखि़रकार जब मसीह के काम में रूकावट डाली गई और उन्हें ज़ख्मी कर दिया गया तो उन्हें कुछ वक्त के लिए आराम की ज़रूरत पड़ी। मालिक ने उन्हें दुनिया से उठा लिया, सशरीर और ज़िन्दा। लेकिन उनके उठा लिए जाने से खुदा का मिशन तो रूकने वाला नहीं था। सो मसीह ने दुनिया से जाने से पहले कहा था कि ‘मैं तुमसे सच कहता हूं कि मेरा जाना तुम्हारे लिए अच्छा है। जब तक मैं नहीं जाऊंगा तब तक वह सहायक तुम्हारे पास नहीं आएगा। परन्तु यदि मैं जाऊंगा तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा। जब वह आएगा तब संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा।‘ (यूहन्ना, 16, 6-8)
‘मुझे तुमसे और भी बहुत सी बातें कहनी हैं। परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा तब तुम्हें सम्पूर्ण सत्य का मार्ग बताएगा। वह मेरी महिमा करेगा , क्योंकि जो मेरी बातें हैं, वह उन्हें तुम्हें बताएगा।
(यूहन्ना, 16, 12-14)
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की भविष्यवाणी पूरी हुई और दुनिया में हज़रत मुहम्मद स. तशरीफ़ लाए। उन्होंने गवाही दी कि ईसा कुंवारी मां के बेटे थे और मसीह थे। खुदा के सच्चे नबी थे, मासूम थे। वे ज़िन्दा आसमान पर उठा लिए गए और दोबारा ज़मीन पर आएंगे और मानव जाति के दुश्मन ‘दज्जाल‘ (एंटी क्राइस्ट) का अंत करेंगे।
हज़रत मुहम्मद स. ने खुदा के हुक्म से हज़रत ईसा अ. के काम को ही अंजाम तक पहुंचाया है
जो बातें मसीह कहना चाहते थे लेकिन कह नहीं पाए, वे सब बातें पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने दुनिया को बताईं और उन्होंने संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय, के विषय में निरूत्तर किया।
आज ज़मीन पर 153 करोड़ से ज़्यादा मुसलमान आबाद हैं। हरेक मुसलमान सिर्फ़ उनकी गवाही की वजह से ही ईसा को खुदा का नबी और मसीह मानते हैं। मरियम को पाक और उनकी पैदाइश को खुदा का करिश्मा मानते हैं। क्या मसीह के बाद दुनिया में हज़रत मुहम्मद स. के अलावा कोई और पैदा हुआ है जिसने मसीह की सच्चाई के हक़ में इतनी बड़ी गवाही दी हो और खुदा की शरीअत को ज़मीन पर क़ायम किया हो ?
‘सत्य का आत्मा‘ हैं हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
अगर आप इसके बावजूद भी हज़रत मुहम्मद स. को ‘सत्य का आत्मा‘ नहीं मानते तो फिर आप बताएं कि ‘सत्य का आत्मा‘ कौन है, जिसे मसीह ने जाकर भेजने के लिए कहा था ?
उनके अलावा आप किसे कह सकते हैं कि उसने सम्पूर्ण सत्य का मार्ग बताया है ?
क्या एक ईसाई के लिए इंजील के खि़लाफ़ अमल करना जायज़ है ?
ख़ैर , हो सकता है कि हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई पर मुतमईन होने में आपको कुछ वक्त लगे लेकिन जिस इंजील पर आप ईमान रखते हैं, उसके खि़लाफ़ अमल करने का आपको क्या हक़ है ?
इंजील के खि़लाफ़ न तो मैं अमल करना चाहता हूं और न ही आपको करने दूंगा।
बहुत बार ऐसा होता है कि जो बात ज्ञानियों से पोशीदा रह जाती हैं, उन्हें मालिक बच्चों पर खोल देता है। (मत्ती, 11, 25)
ज्ञानी में ज्ञान का अहंकार भी आ जाता है और उसे लगता है कि सभी ज़रूरी बातें जो जान लेनी चाहिए थीं उन्हें वह जान चुका है। ज्ञान के उसकी प्यास ख़त्म हो जाती है। प्यास ख़त्म तो समझो तलाश भी ख़त्म और नियम यह है कि ‘जो ढूंढता है वह पाता है।‘
जो ढूंढता है वह पाता है
बच्चे स्वाभाविक रूप से ही जिज्ञासु होते हैं और पक्षपात उनमें कुछ होता नहीं। सत्य को जानने के लिए यही दो आवश्यक शर्तें हैं, जो बच्चे पूरी कर देते हैं और ज्ञानी पूरी कर नहीं पाते। बच्चे ढूंढते और वे पा लेते हैं क्योंकि वे पाने की शर्तों पर खरे उतरते हैं।
मैं भी एक बच्चा ही हूं। मुझे कुछ मिला है। आप इसे देख लीजिये। आपको जंचे तो ठीक है वर्ना क़ियामत के रोज़ मसीह खुद बता देंगे कि उनके किस क़ौल का क्या मतलब था ?
तब बहुत से लोग उनके पास आएंगे और उनसे कहेंगे कि हमने तेरे साथ खाया-पीया था और तूने हमारे बाज़ारों में उपदेश दिया था।, लेकिन मसीह उन्हें धिक्कार कर कहेंगे कि हे कुकर्म करने वालो, तुम सब मुझसे दूर रहो। (लूका, 13, 27)
जीवन की सफलता के लिए ‘सत्कर्म‘ ज़रूरी है
इसीलिए मैं कहता हूं कि बिना सत्कर्म के सिर्फ़ मौज्ज़े और चमत्कार किसी की सच्चाई को परखने का सही पैमाना नहीं है। सत्कर्म का पैमाना केवल ‘व्यवस्था‘ है। यही मसीह की शिक्षा है। चमत्कार तो मसीह ने भी दिखाए और एंटी-क्राइस्ट भी दिखाएगा, लेकिन दोनों में फ़र्क़ यह होगा कि मसीह आये थे जो जो शरीअत को क़ायम करने और मसीह आएगा शरीअत को मिटाने के लिए। सही-ग़लत की पहचान का सही पैमाना शरीअत है, इसमें किसी को कभी धोखा नहीं हो सकता।
खुदा का हुक्म और मसीह की मर्ज़ी दो नहीं, बल्कि एक है
‘मसीह में जीने‘ और ‘खुदा में जीने‘ का मतलब भी यही है कि खुदा की मर्ज़ी और मसीह के तरीक़े में जीना। खुदा की मर्ज़ी और मसीह का तरीक़ा दो नहीं हैं बल्कि ‘एक‘ है। इसीलिए मसीह कहते हैं कि ‘मैं और पिता एक है।‘
खुदा की मर्ज़ी ही मसीह का तरीक़ा है और मसीह के तरीक़े का नाम ही शरीअत है। लोगों की आसानी के लिए शरीअत की तकमील ही मसीह के आने और जाने का मक़सद थी। अब मसीह जिस्मानी ऐतबार से हमारे दरम्यान नहीं हैं लेकिन उनका तरीक़ा हमारे सामने आज भी है। अगर आप मसीह में जीना चाहते हैं तो आपको उनके तरीक़े में जीना होगा। जिस तरह उन्होंने दिन गुज़ारा उस तरह आपको दिन गुज़ारना होगा और जिस तरह उन्होंने रात गुज़ारी उस तरह आपको रात गुज़ारनी होगी। जिस खुदा की उन्होंने इबादत की उसी खुदा की इबादत आपको करनी होगी और जिस खुदा से घुटने टेककर वे दुआ मांगा करते थे उसी खुदा से आपको दुआ मांगनी होगी। तब जाकर आप मसीह के तरीक़े को पा सकेंगे और मसीह में जी सकेंगे।
मसीह ने ज़िन्दगी भर केवल एक ईश्वर की उपासना की है, न तीन की और न ही दो की
यह नहीं कि मसीह तो ज़िन्दगी भर अपने पैदा करने वाले खुदा की इबादत करते रहे, उसी से दुआ मांगते रहे और दुआ पूरी होने पर उसी का शुक्र अदा करते रहे और सभी इस बात के गवाह भी हैं, लेकिन अब आप उनके तरीक़े के खि़लाफ़ खुदा को छोड़कर मसीह की इबादत करने लगें और उन्हीं से दुआएं मांगने लगें और शुक्र भी उन्हीं का अदा करने लगें और कोई पूछे तो आप कह दें कि मसीह ने कहा है कि ‘मैं और पिता एक हैं।‘
भाई ! उनका कहना बिल्कुल सही है लेकिन उनके कहने को उनके करने के साथ जोड़कर तो देखिए।
जब उन्होंने कहा कि मैं और पिता एक हैं, तो क्या वे खुद अपनी इबादत करने लगे थे या मुसीबतों में खुद से ही दुआएं किया करते थे ?
अब उनके शिष्यों को देखिए कि उनके शिष्यों ने उनके मुंह से यह सुनकर क्या किया ?
क्या उनमें से किसी ने कभी खुदा के अलावा किसी की इबादत की ?
या उन्होंने मसीह से कभी घुटने टेककर दुआएं मांगी ?
हालांकि उन्होंने मसीह से सुना कि ‘जो कुछ पिता का है वह सब मेरा है‘ और ‘स्वर्ग और धरती का अधिकार मुझे दे दिया गया।‘ इसके बावजूद भी जब कभी किसी ने मसीह को उत्तम कहा तो उन्होंने यही कहा कि ‘तू मुझे उत्तम क्यों कहता है ? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वर।‘ (मरकुस, 10, 18)
‘तू अपने प्रभु परमेश्वर को प्रणाम कर और केवल उसी की उपासना कर। (लूका, 4, 8)
आखि़री विनती
पादरी राकेश चार्ली साहब और भाई मकेश लॉरैंस साहब से और भी काफ़ी बातें हुईं जिन्हें किसी और वक्त पेश किया जाएगा। मैं नहीं जानता कि इन बातों को उन्होंने कितना माना ? और कितना उन पर विचार किया ?
यही बातें अब मैं आपके सामने रखता हूं। आपको जो बात सही लगे उसे ले लीजिए और जो बात ग़लत लगे मुझे उसके बारे में बता दीजिए ताकि मैं उसे सही कर लूं। मैं आपका शुक्रगुज़ार रहूंगा।
NICE POST
ReplyDeleteकाफी दिलचस्ब बातचीत है, आपके सवाल वाजिब लगते हैं
ReplyDeleteअनवर भाई आपकी यह पोस्ट हज़रत ईसा अलै. के बारे मे बहुत ज्ञान बढ़ाने वाली है । और भ्रांतिया दूर करने वाली है ।
ReplyDeleteअनवर जमाल साहब की बेहतरीन प्रस्तुति.
ReplyDeleteअच्छी जानकारी देने के लिए अनवर जमाल साहब शुक्रिया
Badhia baatcheet hai anwar sahab
ReplyDeletebaki ka baatcheet kab likhoge?
ReplyDeleteNice article, good talk.
ReplyDeleteसवाल तो अच्छे दिए है आपने, सोचने पर मजबूर करते हैं.
ReplyDelete@ जनाब चाँद साहब और अयाज़ साहब ! हौसला अफ़्ज़ाई का शुक्रिया ।
ReplyDelete@ जनाब एडिटर साहब और दीगर तमाम ब्लागर भाइयों ! नबियों का सच्चा आदर यह है कि उनके दिखाए रास्ते पर चला जाए लेकिन लोग चलते हैं अपने मन की इच्छाओं पर और कुछ रस्मों को निभाकर वे इस भ्रम में गिरफ्तार हो जाते हैं कि वे धार्मिक हैं और फिर अगर आप उन्हें टोकें कहेंगे कि हम जमाने के हिसाब से खुद को बदल रहे हैं ।
ReplyDeleteइस तरह पूरी सोसायटी धर्म परिवर्तन किए बैठी है और धर्म परिवर्तन के नाम से चिढ़ती भी है और कांपती भी है ।
गुड़ खाए और गुलगुलों से परहेज़ करना इसी का नाम है ।
ReplyDeletenice post
ReplyDeleteaj tak ke mere ilm me itani bate ek sath Christianity ke bar nahi pata chali jitna ek lekh se chal gai iska sara shreya apko jata hai Allah apke ilm me umr me majid tarakki de
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